एक अमीर ने एक फकीर से पूछा कि दुनिया में महान कौन है?
फकीर ने जवाब दिया- "महान वह है, जो न तो अपने (खुद )को देखता है, न तो अपने को पहचानता है। और दुनिया के आगे अपने को भी भूल जाता है।"
अमीर ने फकीर से फिर कहा- "तुम्हारी बात मेरी समझ मैं नहीं आई। मुझे समझा कर फिर से कहो।"
फकीर हँसा और उसने अपना उदाहरण दिया। उसने कहा- "तुम्हें नहीं मालूम कि मैं यहा बैठे लोगों के सामने हाथ क्यों फैलाता हूं? "
"मैं नहीं जानता।'
"लोग समझते हैं। कि मैं भगवान का नाम लेकर दूसरों से भीख मांगता हूं। वह भी अपने पेट के लिए, मगर ऐसा नहीं है।"
"तो फिर?"
" मैं भले और बुरे की परख करता हूं। मुझे दुनिया के मालिक के दरबार में जाना है। मैं भी परिश्रम करता हूं, जब संसार का स्वामी पूछेगा तो उसे बताऊंगा कि मैं सब को दुआ देता था, यह कहता था। की दुनिया पर ईश्वर की कृपा बनी रहे। अच्छे और बुरे दोनों का भला हो, इसीलिए तो कहता हूं कि जो दे,उसका भी भला और जो न दे, उसका भी भला। मैं हर बंदे को इसलिए दुआ देता हूं कि वह नेक राह पर चलें, नेक काम करें ,और नेकी कर के कुएं में डाल दे।"
आमिर की आंखें खुल गई। उसने फौरन ही फकीर से दूसरा सवाल कर दिया। वह बोला -"मैं महान बनना चाहता हूं ,इसके लिए बताइए कि मैं क्या करूं?"
फकीर " तुम सोचते हो, इसलिए तुम महान कभी नहीं बन सकते हो।"
अमीर" तो क्या करूं?"
फकीर "अपने को भूल जाओ"
अमीर" किस को याद करु?"
फकीर "नेकी और नेक काम करो।"
अमीर" नेकी में रोज करता हूं"
फकीर" कैसे?"
अमीर" मैं लोगों को दान देता हूं।"
फकीर "और यह सोच कर देते हो कि उससे तुम्हारा भला
होगा ?
अमीर "हां।"
फकीर "तुम महान कभी नहीं बन सकते और तुम्हारा भला कभी नहीं हो सकता।"
अमीर "तब मैं क्या करूं?"
फकीर "अपने को भूल जाओ। दूसरों को देखो। दूसरों की सुनो ।दूसरों के काम आओ। जिसकी जो जरूरत हो, उस जरूरत को पूरा करो। मेहनत करो। यदि तुम संसार के लिए परिश्रम करोगे, तो तुम्हारा परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाएगा।"
फिर उसके बात क्या था?
वह अमीर फिर वहां नहीं रुका। उसने पीछे घूम कर भी नहीं देखा। उसने सीधी घर की रहा ली।
तब उसका अंतःकरण कह रहा था की महान सोचने से आदमी कभी महान नहीं बन पाता। उसके कर्म ही उसे महान बनाते हैं। मैं ऐसा परिश्रम और ऐसी रहा अपनाऊं, जो मेरे लिए न होकर दूसरों के लिए हो।
Source: “Haste haste jina sikho”































