Sunday, July 4, 2021

मैं ही गरीब क्‍यों? भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

क्यों पढ़े - आजकल के दौर में अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मैं ही गरीब क्यों। मैं ही दूसरों से कमजोर क्यों हूँ? उन्हें अपने आप में दूसरों के मुकाबले कमी लगती है वे इसका दोष भगवान को देते हैं उन्हें अपनी स्थिति का कारण ठहराते हैं। इस कहानी में आपको इस प्रश्न का संपूर्ण उत्तर मिल जाएगा और आप अपने जीवन से संतुष्ट भी महसूस करेंगे।

    भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

बहुत समय पहले की बात है एक गाँव में धर्म उपदेश देने के लिए लगे हुए शिविर में भगवान गौतम बुद्ध पहुँचे। गाँव के लोग अपनी-अपनी समस्याएं लेकर उनके पास जाते और उनसे समाधान प्राप्त कर नई ऊर्जा के साथ वापस लौटते।

गाँव के बाहर एक गरीब राह में बैठा, बुद्ध के पास आते-जाते लोगों को निहारता रहता, उसने क्या देखा? “दुखी चेहरा लिए भारी क़दमों से लोग भगवान गौतम बुद्ध के शिविर में जाते और नई ऊर्जा के साथ चेहरे पर खुशी व आंनद लिए वापस लौटते।”

गरीब ने सोचा क्‍यों न मैं भी भगवान के पास अपनी समस्या लेकर जांऊ? यह सोचकर हिम्मत करके वह भी शिविर की ओर चल देता है, शिविर में एक-एक कर क्रमबद्ध तरीके से व्यक्ति को प्रवेश मिलता है, इसलिए वह भी अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा। जो कुछ उसने रास्ते में देखा, अब यहाँ उसे साक्षात्‌ देखने को मिल रहा है। लोग एक-एक कर अपनी समस्याएँ बता रहे थे, भगवान गौतम बुद्ध चुपचाप शांति से सब की समस्या सुनते और जवाब देते। 

उसकी भी बारी

आई उसने भगवान गौतम बुद्ध को प्रणाम किया और बोला- “भगवन्‌ मैं ही गरीब क्यों?” भगवान गौतम बुद्ध मुस्कुराए और बोले- “तुमने कभी किसी को दिया ही नहीं इसलिए गरीब हो।” इस पर वह आश्चर्य से वह भगवान गौतम बुद्ध का मुँह ताकने लगा और बोला “भगवन्‌ मेरे पास कुछ देने के लिए है ही नहीं, बड़ी मुश्किल से गुजारा हो पाता है और कभी-कभी तो भूखे ही सोना पड़ता है इतना गरीब हुँ।”

भगवान गौतम बुद्ध शांत भाव से बोले- “तुम्हारे पास एक चेहरा है किसी को भी मुस्कराहट दे सकते हो, तुम्हारे पास मुँह है किसी को भी प्रशंसा भरे कुछ शब्द दे सकते हो, जो हाथ तुम्हारे पास है किसी की भी मदद कर सकते हो।” दरअसल जिस के पास में ये तीन चीजें हैं, वह भला कैसे गरीब हो सकता है? गरीबी का भाव मन में होता है मन से यह भ्रम निकाल दो। लोगों को देते जाओ गरीबी अपने आप ही दूर हो जाएगी। यह बातें सुनकर उस गरीब का चेहरा दमक उठा। उसे अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका है। अब उसके मन से गरीबी का भाव दूर हो गया।          इस शिक्षा को जीवन में उतार कर कुछ ही दिनों में उसका जीवन भी खुशियों से भर गया।

    जीवन की सीख

मंदिर में भी लोग जाते है तो कुछ न कुछ मांगते रहते है और जीवन भर घुट-घुटकर, रो-रोकर समय बिता देते हैं, वे ईश्वर की कृपाओ को कभी कम समझे ही नहीं। जीवन की महत्वता को कभी जाना ही नहीं। इस पर कबीर दास जी ने बहुत बेहतरीन दोहे कहे है आइए पढ़ते है और समझते है।

“सब के पल्‍ले लाल है सभी साहुकार,

गांठ खोल परखा नहीं, या विधि रहा कंगाल”

यानि सभी के पास ज्ञान है, जो कि ईश्वर की अनमोल देन है।

जिसे हम कभी जानने-समझने की कोशिश ही नहीं की इसलिए हम सुख का आंनद नहीं ले पाते।


मित्रों “मनुष्य जीवन” एक अनमोल अवसर है और विधाता की असीम कृपा का तोहफा है, हमारा सर्वप्रथम यह कर्तव्य होता है कि हम उस परम-परमेश्वर की इनायतों को समझें, ईश्वर की कृपा को जानने की कोशिश करें और इसका सबसे आसान तरीका है खुद को समझना, हमारा अस्तित्व क्या है, हमारा लक्ष्य क्या है, हमारे क्या कर्म है  आदि।

उपरोक्त सभी बातों को पढ़कर आज हम यह पूर्णयता समझ चुके हैं कि हमारे पास ईश्वर की दी हुई वो अनमोल तोहफे है जिनसे आज मानव नई-नई उपलब्धियों को पा रहा है, असीम ऊंचाइयों को छू रहा है। बस जरूरत है तो सही मार्गदर्शन की, जो कि आज से मैं इन बातों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश कर दी है।

आपको बस यह करना है

1. हर रोज अपनी एक कमीं को दूर करो चाहे वह आपका गुस्सा हो या फिर नका‌रात्मक सोच   

2. जब भी कुछ सोचो तो अच्छा सोचो

3. अगर कुछ करना का सोचा है तो तब तक उसके पीछे लगे रहो जब तक कि वह काम हो नहीं जाता


Friday, July 2, 2021

जीवन का सत्य (धनवान सेठ की कहानी)

 हर मनुष्य का जन्म इस धरती पर एक विशेष कारण से होता है। जिसे हम धीरे-धीरे समय के साथ समझते चले जाते हैं। कई लोग अपने इस मानवीय जीवन के सत्य को समझ ही नहीं पाते क्योंकि वे हमेशा नकारात्मक सोच ही रखते हैं। यही अंतर है नकारात्मक और सकारात्मक सोच में, जहाँ नकारात्मक सोच हमारे लिए समस्याँए पैदा करती है वही सकारात्मक सोच हमारे लिए नए अवसर लाती है। आइए हम जीवन के इस सत्य को एक कहानी द्‌वारा समझने की कोशिश करते हैं।

 धनवान सेठ की कहानी 


 एक गांव में एक बहुत बड़ा धनवान व्यक्ति रहता था। लोग उसे सेठ धनीराम कहते थे। उस सेठ के पास प्रचुर मात्रा में धन संपत्ति थी जिसके कारण उसके सगे-संबंधी, रिश्तेदार,भाई-बहन हमेशा उसे घेरे रहते थे वे उन्हीं के राग अलापते रहते थे, सेठ भी उन सभी लोगों की काफी मदद करता था। तभी अचानक कुछ समय बाद सेठ को भंयकर रोग लग गया।

इस भयंकर बीमारी का सेठ ने बहुत उपचार करवाया लेकिन इसका इलाज नहीं हो सका। आख़िरकार सेठ की मृत्यु हो गई। यमदूत उस सेठ को अपने साथ ले जाने के लिए आ गए, जैसे ही यमदूत सेठ को ले जाने लगे तभी सेठ थोड़ी दूर जाकर यमदूतो से प्रार्थना करने लगे कि “मुझे थोड़ा सा समय दे दो, मैं लौटकर तुरंत आता हूँ” दूतों ने उसे अनुमति दे दी।


सेठ लौटकर आया, चारो ओर नज़रे घुमायीं और वापस यमदूतों के पास आकर बोला- “शीघ्र चलिए” यमदूत उसे इस प्रकार अपने साथ चलने के लिए तैयार देखकर चकित रह गए और सेठ से इसका कारण पूछा। सेठ ने निराशा भरे स्वरों में कहा- “मैंने हेराफेरी करके अपार धन एकत्रित किया था,

लोगों को खूब खिलाया-पिलाया और उनकी बहुत मदद भी की, सोचा था कि वो मेरा साथ कभी नहीं छोडेंगे। अब जब मैं इस दुनिया को सदा के लिए छोड़ कर जा रहा हूँ, तो वे सब बदल गए है मेरे लिए दुखी होने के बजाय, ये अभी से मेरी संपत्ति को बांटने की योजना बनाने लगे है किसी को मेरे लिए जरा-सा भी अफसोस नहीं है।”

सेठ की बात सुनकर यमदूत बोले- “इस संसार में प्राणी अकेला ही आता है और अकेला ही जाता है, इंसान जो भी अच्छा या बुरा कर्म करता है उसे इसका परिणाम स्वयं ही भुगतना पड़ता है, हर प्राणी इस सत्य को समझता तो है पर देर से।”

 जीवन की सीख 

हम इस बात को अपने जीवन में भी देख रहे हैं। लोग जीवन के सत्य को भूलकर मानव द्वारा बनाए गए जाल जैसे लालच, रूपए-पैसा, बुराई आदि तले दब गए हैं।

आप जो भोजन ग्रहण करते है वह पेट में 4 घंटे रहता है, जो वस्त्र पहनते है वह 4 महीने रहता है, लेकिन जो ज्ञान आप हासिल करते हैं वह आपके अंतिम सांस तक साथ रहता है और संस्कार बनकर आपकी अगली पीढी तक पहुँचता है, ज्ञान का बीज कभी व्यर्थ नहीं जाता। जो है जितना है सफल करते चलो, सफल करने से ही सफलता मिलती है।

हर व्यक्ति को सकारात्मक तरीके से देखो, सुनो और समझो। हम जितना ज्यादा पढ़ते है, सुनते है, समझते है, हमें अपनी कमियों का उतना ही ज्यादा एहसास होता है और इसी कमी को दूर करके हम सफलता की मंजिल की और अपने कदम बढ़ाते चले जाते हैं।

“क्या लेकर आया था जो क्या लेकर जाएगा,

   कर कुछ ऐसा जाओ कि लोग तुम्हें याद रख जाएगें।”

आपको बस यह करना है

1. कोशिश करो कि गलत काम नहीं करना  

2. किसी चीज को लेकर ज्यादा लालची नही होना है

3. Life को Enjoy करते चलो





Thursday, July 1, 2021

कुछ और पाने की चाह


 एक महल के द्वार पर बहुत भीड लगी हुई थी. भीड बढती ही जा रही थी. और दोपहर से भीड बढनी शुरू हुई थी, अब शाम होने आ गई. सारा गांव ही करीब-करीब उस द्वार पर इकट्ठा हो गया.  क्या हो गया था उस द्वार पर राजमहल के ? एक छोटी-सी घटना हो गई और घटना ऐसी बेबूझ थी कि जिसने सुना वह वहीं खडा होकर देखता रह गया. किसी की कुछ भी समझ में न आ रहा था"

एक भिखारी सुबह-सुबह आया और उसने राजा के महल केसामने अपना भिक्षापात्र फैलाया. राजा ने अपने नौकरों से कहा कुछ दे दो इसे. उस भिखारी ने कहा, एक शर्त पर लेता हूं.  यह भिक्षापात्र उसी शर्त पर कोई चीज स्वीकार करता है जब यह वचन दिया जाए कि आप मेरे भिक्षापात्र को पूरा भर देंगे, तभी मै कुछ लेता हूं.

   राजा ने कहा, यह कौन-सी मुश्किल है, छोटा-सा भिक्षापात्र है, पूरा भर देंगे और अन्न से नहीं स्वर्ण अशर्फियों से भर देंगे. भिक्षुक ने कहा, और एक बार सोच लें, पीछे पछताना न पडे.  क्योंकि इस भिक्षापात्र को लेकर मैं और द्वारों पर भी गया हूं और न-मालूम कितने लोगों ने यह वचन दिया था कि वे इसे पूरा भर देंगे. लेकिन वे इसे पूरा नहीं भर पाए और बाद में उन्हें क्षमा मांगनी पडी.  राजा हंसने लगा और उसने कहा कि छोटा-सा भिक्षापात्र. उसने अपने मंत्रियों को कहा, स्वर्ण अशर्फियों से भर दो. यही घटना हो गई थी, राजा स्वर्ण अशर्फियां डालता चला गया था,


 भिक्षापात्र कुछ ऐसा था कि भरता ही नहीं था.  सारा गांव द्वार पर इकट्ठा हो गया था देखने. किसी को समझ में कुछ भी न पडता था कि क्या हो गया है ? राजा का खजाना चुक गया. सांझ हो गई, सूरज ढलने लगा, लेकिन भिक्षा का पात्र खाली था.  तब तो राजा भी घब
राया, गिर पडा पैरों पर उस भिक्षु के और बोला, क्या है इस पात्र में रहस्य ? क्या है जादू ? भरता क्यों नहीं ? उस भिखारी ने कहा, कोई जादू नहीं है, कोई रहस्य नहीं है, बडी सीधी-सी बात है. 

 एक मरघट से निकलता था, वहा पर एक आदमी की खोपडी मिल गई, उससे ही मैंने भिक्षापात्र को बना लिया. और आदमी कि खोपडी कभी भी किसी चीज से भरती नहीं है, इसलिए यह भी नहीं भरता है.  हम भी ठिक इस भिक्षु के पात्र की तरह ही है, चाहे हम कितना ही क्युं न पाले हम भी कभी भरते नहीं है. क्योंकि हम मन के सहारे जीते है.  हमारी मांगे कभी नहीं भरती चाहे हम कुछ भी कर ले फिर भी कुछ और पाने की चाह बनी रहती हैं.

Thursday, June 24, 2021

ढोंगी बिल्ली का षड्यंत्र


 एक वन में एक पेड की खोव में एक चकोर रहता था. उसी पेड के आसपास कईं पेड और थे जिन पर फल व बीज उगते थे. उन फलों व बीजों से पेट भरकर चकोर मस्त पडा रहता.  इसी प्रकार कईं वर्ष बीत गये. एक दिन उडते-उडते एक ओर चकोर सांस लेने के लिए उस पेड की टहनी पर बैठा. दोनो में बातें हई. दूसरे चकोर को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह केवल पेडों के फल व बीज चुग-कर जीवन गुजार रहा था 

     दूसरे चकोर ने उसे बताया भई दुनिया में खाने के लिए केवल फल और बीज ही नहीं होते और भी कईं स्वादिष्ट चीजें है उन्हें भी खाना चाहिए.  खेतों मैं उगने वाले अनाज तो बेजोड होते हैं, कभी अपने खाने का स्वाद बदल कर देखो. दूसरे चकोर के उडने के बाद वह चकोर सोच में पड गया. उसने फैंसला किया कि वह दूर नजर आने वाले खेतों की ओर जायेगा. और उस अनाज नाम की चीज का स्वाद चखकर देखेगा. दूसरे दिन चकोर उडकर एक खेत के पास उतरा खेत में धान की फसल उगी थी

   चकोर ने कोंपले खायी , उसे वह बहुत स्वादिष्ट लगी उस दिन के भोजन में उसे इतना आनन्द आया कि खाकर तृप्त होकर वहीं आंखे मुंदकर सो गया. इसके बाद भी वह वहीं पडा रहा.  रोज खाता पीता और सो जाता. 6-7 दिन बाद उसे सुध आई की घर लौटना चाहिए.

   


 इस बीच एक खरगोष घर की तलाश में घुम रहा था, उस इलाके में जमीन के नीचे पानी भरने के कारण उसका बिल नष्ट हो गया था.  वह उसी चकोर वाले पेड के पास आया और उसे खाली पाकर उसने उस पर अधिकार जमा लिया और वहां रहने लग गया. जब चकोर वापस लौटा तो उसने पाया कि उसके घर पर किसी ओैर का कब्जा हो गया है.

   


 चकोर क्रोधित होकर बोला – ऐं भाई तू कौन है? और मेरे घर में क्या कर रहा है ? खरगोश ने दांत दिखाकर कहा – मैं इस घर का मालिक हूं, मैं सात दिन से यहां रह रहा हूं, यह घर मेरा है.  चकोर गुस्से से फट पडा सात दिन भई मैं इस खो में कईं सालों से रह रहा हूं. किसी भी आसपास के पंछी या चोपाई से पुछ ले.  खरगोश चकोर की बात काटता हुआ बोला – सीधी सी बात है मैं यहां आया यह खोह खाली पडी थी और मैं यहां बस गया. मैं क्यों पडोसीयों से पुछता फिरू ? चकोर गुस्से में बोला – वाह! कोई घर खाली मिले तो क्या, इसका यह मतलब हुआ कि उसमें कोई नहीं रहता.  मैं आखिरी बार कह रहा हूं कि शराफत से कह रहा हूं कि मेरा घर खाली कर दे. खरगोश ने भी उसे ललकारा वरना तू क्या कर लेगा ? यह घर मेरा हैं तुझे जो करना हैं कर ले. चकोर सहम गया.  वह मदद और न्याय की फरियाद लेकर पडोसी जानवरों के पास गया. सबने दिखावा किया परन्तु ठोस रूप से कोई सहायता करने सामने नहीं आया.

   एक बुढे पडोसी ने कहा- ज्यादा झगडा बढाना ठिक नहीं होगा. तुम दोनो आपस में कोई समझौता कर लो. पर समझौते की कोई सुरत नजर नहीं आ रही थी.  अन्त मे लोमडी ने उन्हें सलाह दी तुम किसी ज्ञानी-ध्यानी को पंच बनाकर अपने झगडे का फैसला उससे करवाओं. दोनो को यह सुझाव पसन्द आया. अब दोनो पंच की तलाश में इधर-उधर घुमने लगे. इसी प्रकार घुमते-घुमते वे दोनो एक ही दिन गंगा किनारे आ निकले. 


   वहां उन्हें जप-तप में मगन एक बिल्ली नजर आई. बिल्ली के माथे पर तिलक था, गले में जनेउ, और हाथ मे माला लिये मृगछाला पर बैठी वह पूरी तपस्वीनी लग रही थी.  उसे देखकर चकोर व खरगोष ख़ुशी से उछल पडे. उन्हें भला इससे अच्छा ज्ञानी-ध्यानी और कहां मिलेगा ? खरगोश ने कहा- चकोर जी क्यों न हम इससे अपने झगडे का फैसला करवाये.  चकोर पर बिल्ली का अच्छा प्रभाव पडा था. पर वह जरा घबराया हुआ था. चकोर बोला- मुझे कोई आपत्ति नहीं हैं, पर हमें जरा सावधान रहना चाहिए. खरगो पर तो बिल्ली का जादू चल गया था उसने कहा – अरे नहीं यह बिल्ली सांसारिक मोहमाया त्याग कर तपस्वीनी बन गई है.  सच्चाई तो यह थी कि बिल्ली उन जैसे मूर्ख जीवों को फांसने के लिए भक्ति का नाटक कर रही थी. फिर चकोर और खरगोष पर और प्रभाव डालने के लिए वह जोर-जोर से मंत्र पढने लगी.

 


  खरगोष और चकोर ने उसके निकट आकर और हाथ जयकारा लगाया – जय मातादी. माता को प्रणाम! बिल्ली ने मुस्कुराते हुए धीरे से अपनी आंखें खोली और आशीर्वाद दिया-आयुष्मान भवः।  तुम दोनो के चेहरों पर चिंता की लकीरें है. क्या कष्ट हैं तुम्हें बच्चों ? चकोर ने विनती की माता हम दोनों के बीच एक झगडा है.  हम चाहते हैं कि आप उसका फैसला करें. बिल्ली ने पलकें झपकाई हरे राम , हरे राम तुम्हें झगडना नहीं चाहिए. प्रेम और शान्ति से रहो. उसे उपदेश दिया और बोली – खैर बताओं तुम्हारा झगडा क्या है?  चकोर ने मामला बताया, खरगोष ने अपनी बात कहने के लिए मूंह खोला ही था कि बिल्ली ने पंजा उठाकर उसे रोका और बोली- बच्चों मैं काफी बुढी हूं। ठीक से सुनाई नहीं देता, आंखे भी कमजोर है,  इसलिए तुम दोनो मेरे निकट आकर मेरे कान में जोर से अपनी-अपनी बात कहों ताकि मैं झगडे का कारण जान सकूं. और तुम दोनो को न्याय दे सकूं. 

    जय सियाराम. वे दोनो भक्तिन बिल्ली के बिलकुल निकट आ गये ताकि उसके कानों में अपनी-अपनी बात कह सकें.  बिल्ली को इसी अवसर की तलाश थी. उसने म्याउं की आवाज लगाई और एक ही झपट्टे में खरगोश और चकोर का काम तमाम कर दिया. फिर वह आराम से उन्हें खाने लगी.

Tuesday, June 22, 2021

सिकंदर की कहानी

 


सिकंदर के सिपाहियों ने लूटेरों के सरदार को अथक प्रयास कर आखिर में पकड़ ही लिया और उसके सामने पेश किया. सिकंदर यह देख कर हस्तप्रद रह गया की उस सरदार के चेहरे पर डर का निशान तक नहीं 
था.  

   


       वह बिलकुल निडर हो कर सिकंदर के सामने खड़ा था. लूटेरों के सरदार से वह बोला, ‘यदि तुम चाहो तो माफ़ी मांगकर मुक्त हो सकते हो. वरना तुम्हें भोले-भाले लोगों को लूटने के इल्जाम में सजा भुगतनी पड़ेगी .’  निर्भीक सरदार बोला, मुझे मौत का कतई भय नहीं है. जो आया है, उसे एक-न-एक दिन इस संसार से जाना ही पड़ेगा. फिर एक लूटेरे का दूसरे लूटेरे को दंड देना या क्षमा करने का हक़ ही क्या है ?’  

      सिकंदर ने चौंक-कर पूछा, ‘क्या में तुम्हें लूटेरा नजर आता हूँ ?’ लूटेरे सरदार ने प्रत्युत्तर देते हुए कहा, ‘इसमे क्या शक है ? यदि में राह चलते लोगों को लूटता हूँ तो तुम भी तो राज्यों को लूटते हो.  जो कार्य में लघु स्तर पर करता हूँ, वही कार्य तुम व्यापक स्तर पर करते हों. यदि कोई अंतर है तो वह यह की तुम आजाद हो और में कैदी.’ इतना सुनकर सिकंदर निरुत्तर हो गया और लूटेरे सरदार को मुक्त कर दिया. 

      आज भी इस ज़माने में यही हो रहा हैं, पाप सब कर रहे हैं, भेद सिर्फ मात्रा का हैं.   हम सत्य को कैसे जान सकते हैं. दिया तलें अंधेरा, दिया चाहें उसके पास की जगह को चमका दें लेकिन उसके निचे ही अंधेरा होता हैं. वह खुद अंधेरे में होता हैं.

Sunday, June 20, 2021

युधिष्ठर ने ही समझा उपदेश का सही मर्म


  यह उस समय की बात है जब Kaurava pandav 
गुरु द्रोण के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे | एक दिन गुरु द्रोण ने अपने सभी शिष्यों को एक सबक दिया- ‘ सत्यम वद ‘ मतलब सत्य बोलो |  उन्होंने सभी शिष्यों से कहा की इस पाठ को भली भांति याद कर लें, क्योंकि उनसे यह पाठ कल पूछा जाएगा | अध्यापन काल समाप्त होने के बाद सभी शिष्य अपने-अपने कक्षों में जाकर पाठ याद करने लगे | 

अगले दिन पून: जब सभी शिष्य एकत्रित हुए तो गुरु द्रोण ने सबको बारी-बारी से खड़ा कर पाठ सुनाने के लिए कहा | सभी ने गुरु द्रोण के सामने एक दिन पहले दिया गया शब्द दोहरा दिया, लेकिन युधिष्ठर चुप रहे | गुरु के पूछने पर उन्होंने कहा की वे इस पाठ को याद नहीं कर पाये हैं |  इस प्रकार 15 दिन बीत गए, लेकिन युधिष्ठर को पाठ याद नहीं हुआ | 16 वें दिन उन्होंने गुरु द्रोण से कहा की उन्हें पाठ याद हो गया हैं और वे उसे सुनाना चाहते हैं | द्रोण की आज्ञा पाकर उन्होंने
‘ सत्यम वद ‘ बोलकर सुना दिया 

   


 गुरु ने कहा-युधिष्ठर, पाठ तो केवल दो शब्दों का था | इसे याद करने में तुम्हें इतने दिन क्यों लगें ?  युधिष्ठर बोले- गुरुदेव, इस पाठ के दो शब्दों को याद करके सुना देना कठिन नहीं था, लेकिन जब तक में स्वयं आचरण में इसे धारण नहीं करता, तब तक कैसे कहता की मुझे पाठ याद हो गया है |  

      सच ही है की उपदेश का मर्म वही समझता है जो उसे धारण करना जानता हैं | वाणी के साथ आचरण का अंग बन जाने वाला ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है और इसे धारण करने वाला सच्चा ज्ञानी हैं | लेकिन आज के समय में तो सिर्फ पढ़ा जाता हैं अमल नहीं किया जाता |  कितने सारे लोग है, लगभग सभी ने भगवद गीता पढ़ी होगी, लेकिन युधिष्ठिर की तरह नहीं केवल ऊपर से पढ़ी होगी, शब्द-शब्द पढ़े होंगे |

      जरा सोचिये अगर आज के लोगों ने सच में गीता को पढ़ा होता तो आज जो हमारे मानव समाज की स्थिति हैं क्या ऐसी होती, बात सिर्फ हिन्दू धर्म की नहीं है | सभी धर्म में यही हो रहा हैं, सभी लोगों ने धर्म को ऊपर-ऊपर पढ़ा हैं, लेकिन उसे जाना नहीं | और जब तक आप किसी चीज़ को जान नहीं लेते तब तक आपका उसे पढ़ना व्यर्थ हैं |  


      आप ही सोचिये गीता-कुरान इन सब में लिखा हुआ होता हैं की इनको पढ़ने पर मोक्ष प्राप्त होता हैं | लेकिन लग भग सभी लोग गीता-कुरान पढ़ते हैं फिर उन्हें मोक्ष क्यों नहीं होता, सीधी सी बात हैं क्यूंकि वो सिर्फ पढ़ते हैं, अमल नहीं करते उन बातों पर, अपने जीवन में नहीं ढालते उन बातों को जो की गीता-कुरान में बताई जाती हैं | 

       तो दोस्तों मेरा निवेदन हैं की आप जो भी पढ़ें, उसे सिर्फ पढ़ने तक ही सिमित न रहने दें उसे अपने जीवन में उतारें, उसे अमल करें, मानो मत  मानो  |

Saturday, June 19, 2021

सफलता प्राप्त करने का जूनून


 वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडीसन अपने कार्य में इतने तल्लीन रहा करते थे की प्रयोगशाला से बाहर निकलने को भी फुर्सत नहीं होती थी | इस आदत से उनकी पत्नी बहुत परेशान रहती थी | एक दिन एडिसन प्रयोगशाला में कोई प्रयोग कर रहे थे | उनकी पत्नी ने उन्हें बार-बार पुकारा |

लेकिन वह इतने तल्लीन थे की उन्होंने आवाज़ नहीं सुनी |  कार्य समाप्त होने पर जब वह बाहर आए तो उनकी पत्नी बोली, ‘ आप नित्य रात-दिन काम में लगे रहते हैं | कभी मन बहलाव के लिए अन्य कार्य भी कर लिया करें |


’ एडिसन बोले, ‘ अच्छा तो बताओ, अवकाश करने मुझे कहाँ जाना चाहिए ?’ उनकी पत्नी बोली, ‘कहीं भी जा सकते हो, जहाँ आपका मन चाहे | ‘ठीक है, में वहीँ चला जाता हूँ |’ इतना कहकर वह फिर से प्रयोगशाला में चले गए |  इसे कहते है सफलता प्राप्त करने का जूनून | आप अगर सफल होना चाहते हैं तो ठीक इसी तरह अपने लक्ष्य में डूब जाये | यही सफलता की Secret हैं 

 


 सकारात्मक एडिसन – लगातार जोरों की मेहनत करने के बाद भी एडिसन को स्टोरेज बैटरी बनाने में 25 बार असफलता मिली | लेकिन वे हिम्मत नहीं हारे और उन्होंने 26 वि बार नए तरीके से अविष्कार करने का सोचा और वह सफल हुए |  स्टोरेज बैटरी को बनाने में सफलता हासिल करने के बाद किसी ने उनसे पूछा की आपको यह सफलता हासिल करने में 25 असफलताओ का सामना करना पढ़ा, इसमें आपका मूल्यवान समय व्यर्थ ही चला गया, 


इन 25 बारों के असफल प्रयोगो के बारें में आप क्या कहना चाहेंगे |  तब एडिसन ने उत्तर दिया – आपका नजरिया बिलकुल ही गलत है, मैने इन 25 असफल प्रयोगों में कुछ भी व्यर्थ नहीं गंवाया | जबकि मुझे तो 25 ऐसे तरीके मालुम हुए, जिन्हें उपयोग करने से स्टोरेज बैटरी का बनना नामुंकि होता है |

जीवन की सच्चाई


 एक शिक्षक था, जवान लडको को पेंड़ो पर चढना सिखाता था। एक लडके को सिखा रहा था। वहां एक राजकुमार सीखने के लिए आया हुआ था। राजकुमार ऊपर की चोंटी तक चढ गया था, वृक्ष की ऊपर की शाखाओं तक।  फिर उतर रहा था, वह बूढा (teacher) चुपचाप पेड़ के नीचे बैठा हुआ देख रहा था। कोई दस फ़ीट नीचे रह गया होगा वह लड़का, तब वह बूढा खडा हुआ और चिल्लाया, सावधान! बेटे सावधान होकर उतरना, होश से उतरना!  वह लड़का बहुत चकित हुआ। उसने सोचा, या तो यह बूढा पागल है। जब मैं सौ फीट ऊपर था और जहां से गिरता तो मेरे बचने का कोई chance नहीं था – 

जब मैं बिल्कुल ऊपर की चोटी पर था, तब तो यह कुछ नहीं बोला, चुपचाप आंख बंद किए, पेड़ के नीचे बैठा रहा! और अब! अब जबकि मैं नीचे ही पहुंच गया हूं, अब कोई खतरा नहीं है तो पागल चिल्ला रहा है, सावधान! सावधान!  नीचे उतरकर उसने कहा कि मैं हैरान हूं! जब मैं ऊपर था, तब तो आपने कुछ भी नहीं कहा- जब डेंजर था, खतरा था ? और जब मैं नीचे आ गया, जहां कोई खतरा न था, उस बूढें ने कहा

        मेरे जिंदगी का अनुभव यह हैं कि जहां कोई खतरा नहीं होता, वहीँ आदमी सो जाता है।  और सोते ही खतरा शुरू हो जाता है। ऊपर कोई खतरा न था… क्योंकि खतरा था और उसकी वजह से तुम जागे हुए थे, सचेत थे, तुम गिर नहीं सकते थे। मैंने आज तक ऊपर की चोटी से किसी को गिरते नहीं देखा… कितने लोगो को मैं सिखा चुका।  जब भी कोई गिरता हैं तो दस-पंद्रह फीट नीचे उतरने में या चढने में गिरता है। क्योकि वहां वह निश्चिन्त हो जाता है। निश्चिन्त होते ही सो जाता है। सोते ही खतरा मौजुद हो जाता है। जहां खतरा मौंजूद है, वहां खतरा मौंजूद नहीं होता, क्योंकि वह conscious होता है। जहां खतरा नही है, वहां खतरा मौंजूद हो जाता है, क्योंकि वह सो जाता है। इंसान सभी पक्षियों से ज्यादा सो गया है।  क्योंकि जीवन में उसने सभी पक्षियों-पशुओ से ज्यादा Security सुविधा जुटा ली है।


 कोई पशु-पक्षी इतना sleeping हुआ नहीं, जितना आदमी। देखें, किसी कौए को आपके घर के पास बैठा हुआ। जरा आप आंख भी हिलाएं और कौआ अपने पर फैला देगा। आंख हिलाएं! आप जरा हाथ हिलाएं और कौआ तैयार है, सचेत है। जानवरों को भागते हुए देखें, दौडते हुए देखें, उनको खडे हुए देखें …. वे सचेत है।  आदमी ने एक तरह की security, एक तरह की सुरक्षा अपने चारों तरफ खडी कर ली है। और उस सुरक्षा की वजह से वह आराम से सो गया है। और सच्चाई यह हैं कि सब security झुठी है। क्योंकि मौत इतनी बडी असलियत हैं कि हमारी सब सुरक्षा झूठी ही सिद्ध होती है।

       


 कोई सुरक्षा हमारी सच्ची नहीं है। लेकिन a False, एक मिथ्या खयाल हमने पैदा कर लिया है कि हम सुरक्षित है। 
सुरक्षित  असुरक्षा है, insecurity है।  कौन सी चीज सुरक्षित है ? आपकी पत्नी सुरक्षित है… कि आप सोचते हैं, कल भी वह आपकों प्रेम देगी ? आपके बच्चे सुरक्षित हैं… कि आप सोचते हैं, वे बडे होने पर आपको आदर देंगे ? आपके मित्र सुरक्षित हैं… कि वे कल शत्रु नहीं हो जाएंगे ? आप खुद किन अर्थों में सुरक्षित है ? आपकी मौत आपकी सब सुरक्षा को दो कौडी का सिद्ध कर देने को है।

Friday, June 18, 2021

महत्वकांक्षी कौआ


 एक कोआ जब-जब मोरों को देखता मन में कहता भगवान ने 
मोरों  को कितना सुन्दर रूप दिया है। यदि मैं भी ऐसा सुन्दर रूप पाता तो कितना मजा आता।  एक दिन कोए ने जंगल में मोरो के बहुत से पंख बिखरे देखे वह बहुत प्रसन्न होकर कहने लगा- वाह भगवान!

बडी कृपा की आपने जो मेरी पुकार सुन ली।  मैं अभी इन पंखों से अच्छाखासा मोर बन जाता हूं। इसके बाद कोए ने मोरों के पंख अपने पंख के आसपास लगा लिए। फिर वह नया रूप देखकर बोला- अब तो मैं मोरों से भी सुन्दर हो गया हूं, अब उन्हीं के पास चलकर आनन्द मनाता हू।  वह बडे अभिमान से मोरों के सामने पहूंचा। उसे देखते ही मोरों ने ठहाका लगाया।         

एक मोर ने कहा- जरा देखो इस दुष्ट कोए को यह हमारे फेंके हुए पंख लगाकर मोर बनने चला है।  लगाओं बदमाश को चोंचे व पंजों से कसकर ठोकरे यह सुनते ही सभी मोर कोए पर टूट पडे। और मार-मार कर उसे अधमरा कर दिया।

कोआ भागा-भागा अन्य कोओं के पास जाकर मोरो की शिकायत करने लगा तो एक बुजुर्ग कोआ बोला- सुनते हो इस अधम की बातें। यह हमारा उपहास करता था और मोर बनने के लिए बावला रहता था इसे इतना भी ज्ञान नही कि जो प्राणी अपनी ही जाति से संतुष्ट नही रहता वह हर जगह अपमान पाता है।

आज यह मोरो से निपटने के बाद हमसे मिलने आया है। इतना सुनते ही सभी कोओ ने मिलकर उसकी अच्छी मरम्मत की। 
       कथा का सार यह हैं कि ईष्वर ने ।हम हमेशा दूसरों की चीजों को देख कर सोचते हैं काश ये मेरे पास होता, लेकिन जो हमारे पास हैं उसके लिए हम कभी खुश नहीं होते जबकि ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास उतना भी नहीं होता जितना हमारे पास होता हैं

Saturday, June 12, 2021

शेख का आदेश और लुकमान की समझ


 प्राचीनकाल में अरब में आमिर लोग निर्धनों को खरीदकर गुलाम बनाकर रखते थे | ऐसा ही एक गुलाम था लुकमान | लुकमान अपने मालिक ( जो एक शेख था ) के प्रति अत्यंत वफादार था | वह अपने मालिक की हर प्रकार से सेवा करता था |

  लुकमान बुध्दिमान भी था | यह बात शेख को भी पता थी और इसलिए वह लुकमान से जब-तब तर्कपूर्ण चर्चाएं करता था | वह अक्सर लुकमान से विचित्र प्रश्न पूछकर उसके ज्ञान की परीक्षा लेता और लुकमान भी उसे कभी निराश नहीं करता था |  एक बार शेख ने उससे कहा – लुकमान ! जाओ बकरे का जो श्रेष्ठ अंग हो, उसे काटकर ले आओ | लुकमान गया और तुरंत बकरे की जीभ काटकर ले 
आया |

शेख ने पुन: उसे आदेश दिया अब जाकर बकरे का वह 
अंग लेकर आओ, जो सबसे बुरा है | लुकमान तुरंत गया और थोड़ी देर बाद एक अन्य बकरे की जीभ काटकर ले आया |  यह देख कर शेख ने कहा यह क्या, इस बार भी तुम बकरे की जीभ काट लाए ?

लुकमान ने जवाब दिया मालिक ! शरीर के अंगो में जीभ ही ऐसी है जो सबसे अच्छी भी और बुरी भी | यदि जीभ से उत्तम वाणी बोली जाए तो यह सभी को अच्छी लगती है और उसी से कटु वचन बोले जाएं तो यह सबको बुरी लगने लगती है | शेख एक बार फिर लुकमान की बुद्धि का कायल हो गया | 

सार यह हैं की वाणी की मधुरता से हम दुश्मन को भी अपना बना सकते हैं, जबकि कर्कश वाणी के चलते अपनों को भी परे होने में ज्यादा देर नहीं लगती | हमें दूसरों के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए | जीभ तो हमें परमात्मा का दिया हुआ उपकार हैं यह हमारे ऊपर निर्भर करता हैं, की हम उसका कैसा उपयोग करें | तो दोस्तों हमेशा इस जीभ का सकारात्मक उपयोग करें.

मैं ही गरीब क्‍यों? भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

क्यों पढ़े - आजकल के दौर में अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मैं ही गरीब क्यों। मैं ही दूसरों से कमजोर क्यों हूँ? उन...