सिकंदर के सिपाहियों ने लूटेरों के सरदार को अथक प्रयास कर आखिर में पकड़ ही लिया और उसके सामने पेश किया. सिकंदर यह देख कर हस्तप्रद रह गया की उस सरदार के चेहरे पर डर का निशान तक नहीं था.
वह बिलकुल निडर हो कर सिकंदर के सामने खड़ा था. लूटेरों के सरदार से वह बोला, ‘यदि तुम चाहो तो माफ़ी मांगकर मुक्त हो सकते हो. वरना तुम्हें भोले-भाले लोगों को लूटने के इल्जाम में सजा भुगतनी पड़ेगी .’ निर्भीक सरदार बोला, मुझे मौत का कतई भय नहीं है. जो आया है, उसे एक-न-एक दिन इस संसार से जाना ही पड़ेगा. फिर एक लूटेरे का दूसरे लूटेरे को दंड देना या क्षमा करने का हक़ ही क्या है ?’
सिकंदर ने चौंक-कर पूछा, ‘क्या में तुम्हें लूटेरा नजर आता हूँ ?’ लूटेरे सरदार ने प्रत्युत्तर देते हुए कहा, ‘इसमे क्या शक है ? यदि में राह चलते लोगों को लूटता हूँ तो तुम भी तो राज्यों को लूटते हो. जो कार्य में लघु स्तर पर करता हूँ, वही कार्य तुम व्यापक स्तर पर करते हों. यदि कोई अंतर है तो वह यह की तुम आजाद हो और में कैदी.’ इतना सुनकर सिकंदर निरुत्तर हो गया और लूटेरे सरदार को मुक्त कर दिया.
आज भी इस ज़माने में यही हो रहा हैं, पाप सब कर रहे हैं, भेद सिर्फ मात्रा का हैं. हम सत्य को कैसे जान सकते हैं. दिया तलें अंधेरा, दिया चाहें उसके पास की जगह को चमका दें लेकिन उसके निचे ही अंधेरा होता हैं. वह खुद अंधेरे में होता हैं.



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