Wednesday, August 26, 2020

"भरोसेमंद और वफादार बने"

  

 बचपन के दो ऐसे दोस्त थे जो स्कूल, कॉलेज और यहाँ  तक की फौज मैं भी साथ ही भर्ती हुए।

 

 

युद्ध छिड़ गया और दोनों एक ही यूनिट में थे, एक रात उन पर हमला हुआ, चारों तरफ गोलियाँ  बरस रही थी। ऐसे में अंधेरे से एक आवाज आई, "हैरी(Harry), इधर आओ, मेरी मदद करो।" हैरी ने अपने बचपन के दोस्त बिल(Bill) की आवाज फौरन पहचान ली। उसने अपने कैप्टन से पूछा, "क्या मैं जा सकता हूं?" कैप्टन ने जवाब दिया, "नहीं, मैं तुम्हें जाने की इजाजत नहीं दे सकता, मेरे पास पहले से ही आदमी है, मैं अपने एक और आदमी को नहीं खोना चाहता। साथ ही बिल की आवाज से भी ऐसा लगता है कि वह बचेगा नहीं।" हैरी चुप रहा। फिर वही आवाज आई, "हैरी, आओ, मेरी मदद करो।" हैरी चुप बैठा रहा क्योंकि कैप्टन ने उसे जाने की इजाजत नहीं दी थी। वही आवाज बार-बार आई। हैरी अपने को और ज्यादा रोक नहीं सका और उसने कैप्टन से कहा, "कैप्टन, वह मेरा मेरे बचपन का दोस्त है, मुझे उसकी मदद के लिए जाना ही होगा।" कैप्टन ने बेमन से उसे जाने की इजाजत दे दी। हैरी अंधेरे में रेंगता हुआ आगे बढ़ा और बिल को खींचकर अपने खड्डे में ले आया। उन लोगों ने पाया कि बिल तो मर चुका था। अब कैप्टन नाराज हो गया,


और हैरी पर चिल्लाया, "मैंने कहा था न कि वह नहीं बचेगा, वह मर गया है और तुम भी मारे जाते, मैं अपना एक और आदमी खो बैठता, तुमने वहाँ जाकर गलती की थी।" हैरी ने जवाब दिया, कैप्टन, मैंने जो किया, वह ठीक था। जब मैं बिल के पास पहुँचा तो वह जिंदा था, और उसके आखिरी शब्द थे।  "हैरी, मुझे यकीन था कि तुम जरूर आओगे।"


अच्छे रिश्ते बड़ी मुश्किल से बनते हैं और एक बार बन जाएँ , तो उन्हें निभाना चाहिए।

हमसे अक्सर कहा जाता है, अपने सपनों को साकार करो। मगर हम अपने सपनों को दूसरों की कीमत पर असलियत का रूप नहीं दे सकते। ऐसा करने वालों के पास चरित्र नहीं होता। हमें अपने परिवार, दोस्तों और उन लोगों के लिए, जिनकी हम परवाह करते हैं और जो हम पर निर्भर हैं, अपने निजी हितों का त्याग करना चाहिए।



Source-   जीत आपकी



"भाग्य उनकी मदद करता है, जो अपनी मदद खुद करते हैं"


 एक कस्बे में बाढ़ आई। एक आदमी के सिवा वहां रहने वाला हर आदमी किसी सुरक्षित स्थान पर जा रहा था। जिस आदमी ने अपनी जगह नहीं छोड़ी, उसका कहना था, ,"मुझे विश्वास है कि भगवान मेरी रक्षा करेगा।" पानी का स्तर बढ़ने पर उसे बचाने के लिए एक जिप आई। पर उस आदमी ने यह कहकर जाने से इंकार कर दिया," मुझे विश्वास है कि भगवान मेरी रक्षा करेगा।" पानी का स्तर और बढ़ने पर वह अपने मकान की दूसरी मंजिल पर चला गया। तब उसकी मदद करने के लिए एक नाव आई। उस आदमी ने उसके साथ भी यही कह कर जाने से इनकार कर दिया कि "मुझे विश्वास है, भगवान मेरे रक्षा करेगा।" पानी का स्तर बढ़ता जा रहा था।


वह आदमी अपने मकान की छत पर चला गया। उसकी मदद के लिए हेलीकॉप्टर आया। लेकिन उस आदमी ने अपनी वही बात फिर दोहराई "मुझे विश्वास है, भगवान मेरी रक्षा करेगा।" आखिरकार वह डूब कर मर गया। भगवान के पास पहुंचने पर उसने उनसे गुस्से भरे लहजे में सवाल किया, "मुझे आप पर पूरा विश्वास था, फिर आपने मेरी प्रार्थनाओ को अनसुना कर मुझे डूबने क्यों दिया?" भगवान ने जवाब दिया, "तुम क्या सोचते हो- तुम्हारे पास जीप, नाव और हेलीकॉप्टर  किसने भेजा था?"



भाग्यवादी नजरिए से उभरने का केवल एक ही तरीका है कि हम जिम्मेदारियां कबूल करें, और किस्मत पर यकीन करने के बजाय 'वजह ओर नतीजे' के सिद्धांत में विश्वास करे। जिंदगी मैं कोई लक्ष्य, इंतजार, चाहत और अचंभित होकर सोच- विचार करते रहने से नहीं, बल्कि काम, तैयारी और योजना से हासिल होता है।

source-jit apki

Wednesday, August 19, 2020

"अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करो"



 जॉन(John) नाम का एक लकड़हारा, एक कंपनी में पांच साल से काम कर रहा था, पर उसे कभी तरक्की नहीं मिली। उसी कंपनी ने बिल (Bill) नाम के एक और लकड़हारे को भी नौकरी पर रखा, और उसे साल भर मैं ही तरक्की मिल गई।

जॉन ने बिल को एक साल के अंदर ही तरक्की दिए जाने का विरोध किया, और इस बारे में बात करने के लिए अपने बॉस के पास गया। उसके बॉस ने जवाब दिया, "तुम्हें अब भी उतने ही पेड़ काटते हो, जितने कि पांच साल पहले काटते थे। हमारी कंपनी में नतीजे को देखा जाता है। अगर तुम अधिक पेड़ काटने लगो तो हमे तुम्हारा वेतन बढ़ा कर खुशी होगी।" जॉन वापस लौट आया। उसके बाद वह अधिक मेहनत से, और ज्यादा देर तक पेड़ काटने लगा। इसके बावजूद वह ज्यादा पेड़़ नहीं काट सका। उसने अपनी यह परेशानी बॉस को बताई।

बॉस ने उसे बिल से बात करने का सुझाव दिया।  उसने कहा, "शायद बिल को कुछ मालूम है, जो मैं और तुम नहीं जानते। जॉन ने बिल से पूछा कि वह ज्यादा पेड़  कैसे काट लेता है। बिल ने जवाब दिया, "मैं हर पेड़ काटने के बाद दो मिनट के लिए काम रोक देता हूं, और अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करता हूं।


       तुमने अपनी कुल्हाड़ी की धार आखिरी बार  कब तेज तेजी की थी?"

पिछली शिक्षा और गौरव का ज्यादा महत्व नहीं होता। हमें अपनी कुल्हाड़ी की धार लगातार तेज करनी  होगी।


          शिक्षा के बिना भी व्यावहारिक बुद्धि हासिल की जा सकती है लेकिन व्यवहारिक बुद्ध के बिना अच्छी- से-अच्छी शिक्षा भी किसी काम की नहीं। भरपूर व्यवहारिक बुद्धि का होना ही बुद्धिमत्ता कहलाता है।



Source: - Jeet Aapki

"संघर्ष"


हमारा इम्तहान लेने के लिए जिंदगी में कभी जीत की खुशियां आती है, तो कभी कम मिलते हैं। यह हम पर निर्भर है कि उसका सामना कैसे करें। जीत कोशिश किए बिना नहीं मिलती।

       जीव विज्ञान(Biology) के एक अध्यापक अपने छात्रों को पढ़ा रहे थे की सूँड़ी (caterpillar) तितली में कैसे बदल जाती है। उन्होंने छात्रों को बताया कि कुछ ही घंटों में तितली अपनी खोल से बाहर निकलने की कोशिश करेगी। उन्होंने छात्रों को आगाह किया, कि वे खोल से बाहर निकलने में तितली की मदद न करें। इतना कह कर कक्षा से बाहर चले गए।

       छात्र इंतजार करते रहे। तितली खोल से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगी। छात्र को उस पर दया आ गई। अपने अध्यापक की सलाह  न मान कर उसने खोल से बाहर निकलने की कोशिश कर रही तितली की मदद करने का फैसला किया। उसने खोल को तोड़ दिया, जिसकी वजह से तितली को बाहर निकलने के लिए और मेहनत नहीं करनी पड़ी। लेकिन वह थोड़ी ही देर में मर गई। 

        वापस लौटने पर शिक्षक को सारी घटना मालूम हुई। तब उन्होंने छात्रों को बताया कि खोल से बाहर आने के लिए तितली को जो संघर्ष करना पड़ता है, उसी की वजह से उसके पंखों को मजबूती और शक्ति मिलती है।  यही प्रकृति का नियम है। तितली की मदद करके छात्र ने उसे संघर्ष करने का मौका नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि वह मर गई।

       अपनी जिंदगी पर भी यही उसूल लागू कीजिए। जिंदगी में कोई भी कीमती चीज संघर्ष के बिना नहीं मिलती। मां- बाप अपने बच्चों को शक्ति हासिल करने के लिए संघर्ष करने का मौका नहीं देते। इस तरह वे जिन्हें सबसे अधिक चाहते हैं उन्ही को नुकसान पहुंचा बैठते हैं। 

 

बी.सी.फोर्ब्स:-

           इतिहास बताता है कि बड़े-बड़े विजेताओं को भी जीत से पहले हताश कर देने वाली बाधाओं का सामना करना पड़ा।  उन्हें जीत इसलिए मिली की वे अपनी असफलताओं से मायूस नहीं  हुए|




Source: Jeet Aapki


Sunday, August 16, 2020

"तलाश सोने की"


एंड्रयू कार्नेगी(Andrew Carnegie) अपने बचपन के दिनों में ही स्कॉटलैंड(Scotland) से अमेरिका(America) चले गए। उन्होंने छोटे-मोटे कामों से शुरुआत की, और आखिरकार अमेरिका में स्टील बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी के मालिक बन गए। एक ऐसा वक्त आया जब उनके लिए 43 करोड़पति काम करते थे।  करोड़ रुपए इस जमाने में भी बहुत होते हैं, लेकिन सन् 1920 के आसपास तो उनकी बहुत ज्यादा कीमत थी।

        किसी ने कार्नेगी से पूछा, "आप लोगों से कैसे पेश आते हैं?" उन्होंने जवाब दिया- "लोगों से पेश आना काफी हद तक सोने की खुदाई करने जैसा ही है। हमको एक तोला(Ounce) सोना खोद निकालने के लिए कई टन मिट्टी हटानी पड़ती है। लेकिन खुदाई करते वक्त हमारा ध्यान मिट्टी पर नहीं, बल्कि सोने पर रहता है।"

       एंड्रयू कार्नेगी के जवाब में एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश छिपा हुआ है। हो सकता है कि किसी इंसान, या किसी हालत में कोई अच्छी बात साफ तौर पर न दिखाई दे रही हो। ऐसी हालत में हमें उसे गहराई में जाकर तलाशना होगा।


         हमारा मकसद क्या है? सोना तलाशना। अगर हम किसी इंसान, या किसी चीज में कमियांँ  ढूंँढेगे, तो हमको ढेरों कमियांँ  दिखाई देगी। लेकिन हमें किस चीज की तलाश है- सोने की, या मिट्टी की? कमियांँ  ढूंँढने वाले तो स्वर्ग में भी कमियांँ  निकाल देंगे। अधिकतर लोगों को वही मिलता है, जिसकी उन्हें तलाश होती है।


Source: Jeet Aapki

Friday, August 14, 2020

"हीरो से भरा खेत"

  


हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हाफीज खुश इसलिए था  कि वह संतुष्ट था। एक दिन एक अक्लमंद आदमी उसके पास आया। उसने हफीज को हीरो के महत्व और उनसे जुड़ी ताकत के बारे में बताया। उसने हफीज से कहा," अगर तुम्हारे पास अंगूठे जितना भी बड़ा हीरा हो, तो तुम पूरा शहर खरीद सकते हो, और अगर तुम्हारे पास मुट्ठी जितना बड़ा हीरा हो तो तुम अपने लिए शायद पूरा देश ही खरीद लो।" वह अक्लमंद आदमी इतना कह कर चला गया। उस  रात हफीज सो नहीं सका।वह असंतुष्ट हो चुका था, इसलिए उसकी खुशी भी खत्म हो चुकी थी।

        दूसरे दिन सुबह होते ही हफीज ने अपने खेतों को बेचने और परिवार की देखभाल का इंतजाम किया, और हीरे खोजने के लिए रवाना हो गया। वह हीरो की खोज में पूरे अफ्रीका में भटकता रहा, पर उन्हें पा नहीं सका। उसने उन्हें यूरोप में भी ढूंढा, पर वे उसे वहाँ भी नहीं मिले। स्पेन पहुंचते-पहुंचते वह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्तर पर पूरी तरह टूट चुका था। वह इतना मायूस हो चुका था कि उसने बार्सिलोन नदी में कूदकर खुदकुशी कर ली।

        इधर जिस आदमी ने हाफीज के खेत खरीदे थे, वह एक दिन उन खेतों से होकर बहने वाले नाले में अपने ऊंटो को पानी पिला रहा था। तभी सुबह के वक्त उग रहे सूरज की किरणें नाले के दूसरी ओर पड़े, एक पत्थर पर पड़ी, और वह इंद्रधनुष की तरह जगमगा उठा। यह सोच कर कि वह पत्थर उसकी बैठक में अच्छा दिखेगा, उसने उसे उठा कर अपनी बैठक मैं सजा दिया।  उसी दिन दोपहर में हफीज को हीरो के बारे में बताने वाला आदमी खेतों के इस नए मालिक के पास आया। उसने उस जगमगाते हुए पत्थर को देखकर पूछा, "क्या हाफीज लौट आया?" नए मालिक ने जवाब दिया, "नहीं, लेकिन आपने यह सवाल क्यों पूछा?"अक्लमंद आदमी ने जवाब दिया, "क्योंकि यह हीरा है। मैं उन्हें देखते ही पहचान जाता हूं।" नए मालिक ने कहा, "नहीं, यह तो महज एक पत्थर है। मैंने इसे नाले के पास से उठाया है। आइए, मैं आपको दिखाता हूं। वहाँ पर ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैं। उन्होंने वहांँ  से नमूने के तौर पर बहुत सारे पत्थर उठाए, और उन्हें जांचने - परखने के लिए भेज दिया।वे पत्थर हीरे ही साबित हुए। उन्होंने पाया कि उस खेत में दूर-दूर तक हीरे दबे हुए थे।


           इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?  

जब हमारा नजरिया सही होता है, तो हमें महसूस होता है कि हम हीरो से भरी हुई जमीन पर चल रहे हैं। मौके हमेशा हमारे पावों तले दबे हुए हैं। हमें उनकी तलाश में कही जाने की जरूरत नहीं है। हमें केवल उनको पहचान लेना है।

     मौका जब आता है, तो लोग उसके अहमियत नहीं पहचानते। जब मौका जाने लगता है, तो उसके पीछे भागते हैं

     कोई मौका दोबारा नहीं खटखटाता। दूसरा मौका पहले वाले मौके से बेहतर  या बत्तर हो सकता है, पर वह ठीक पहले वाले मौके जैसा नहीं हो सकता। इसीलिए सही वक्त पर सही फैसला लेना बेहद जरूरी होता है। गलत वक्त पर लिया गया सही फैसला भी गलत फैसला बन जाता है।


“माँ का जिम्मेदार बेटा”

 एक बालक की मां लोगों के कपड़े धोती है। और 8 वर्ष की अवस्था में उस बालक ने अपनी मां से लोगों की सेवा का काम छुड़ावा दिया। गांव के स्टोर में वह दिन-भर नौकरी करता था। और सांयकाल एक स्थानीय प्रेस में चिट्टियां और प्रूफ लाने- ले जाने का काम करता था। हर प्रकार का त्याग और बलिदान कर उसने मां को दूसरों की सेवा से अंततः मुक्त कराया। वह भी 13 वर्ष की उम्र में अपने पांच भाई बहनों के भोजन,वस्त्र तथा शिक्षा का भार उसने अपने ही कंधों पर उठाया। उसके जीवन- चरित्र में यह सभी वितरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। अभावों  में उसे और संघर्ष करना पड़ता था, पर उसने साहस तथा आत्मनिर्भरता से कभी मुंह नहीं मोड़ा। हिम्मत हारना वह जानता न था। कठिनाइयों के बीच अपने जीवन को ऊंचा उठाने का अवसर आया। फिर भला बाधाओं से उसे क्या भय हो सकता था?

उसने सोचा था, 'मैं अपनी पथ- बाधाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली हूं।'

       शीतकाल में जब हिमपात होता था। और कपड़ों की कमी की वजह से वह ठिठुरता- कांपता ड्यूटी पर जाता और परिवार का बोझ उसके कोमल कंधों को दबा रहा होता, तब भी वह क्षण मात्र के लिए विचलित न हुआ। वह आगे ही आगे बढ़ता चला गया। उसका दृढ़ निश्चय ही उसे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करता रहा था। उसने अवसर की प्रतीक्षा कभी नहीं की।

      प्रायः कुछ लोग ऐसी ही मिट्टी के बने होते हैं कि वे हारना नहीं जानते,वे ऊंघते नहीं उबासियां नहीं लिया करते, आगे ही आगे बढ़ते चले जाते हैं। किसी की सहायता की प्रतीक्षा नहीं करते। अपनी सहायता अपने आप करते हैं। किसी अवसर की प्रतीक्षा नहीं करते, बल्कि स्वयं अवसर का निर्माण करते हैं।  


Wednesday, August 12, 2020

"अवसर आपकी प्रतीक्षा में है"

 

जब सिकंदर एक शहर जीत चुका ,तो उससे किसी ने पूछा- ।

'यदि अवसर मिला तो क्या आप अगला शहर भी जीतेंगे? 'सिकंदर तमतमा कर बोला - 'अवसर? अवसर! अवसर क्या होता है? मैं स्वयं अवसर का निर्माण करता हूं।'



       अवसर की प्रतीक्षा में समय खोना गलत बात है। धीरे- धीरे यह आदत बन जाती है। अवसर की प्रतीक्षा करते रहने से कठोर कार्य के लिए शक्ति तथा इच्छा भी नष्ट हो जाती है। जो कुछ नहीं कर रहे, उन्हें अवसर कभी नहीं मिलता। जो अवसर के लिए दूर-दूर  देखते रहते हैं,  व्यर्थ समय खो रहे हैं। 

        कुछ व्यक्ति भाग्य पर विश्वास करने लगते हैं कि उन्हें कहीं भी चांस दिखाई नहीं देता।वे चाहे सोने की खान के पास से होकर निकल जाए तो भी वह उन्हें दिखलाई नहीं पड़ती। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो बंजर जगह में भी अवसर ढूंढ लेते हैं।


 बनयन के बारे में

    

    बनयन ने बेडफोर्ड जेल में अपने लिए अवसर देख लिया और संसार के महान रूपक काव्य की रचना कर डाली। आप पूछंगे कि जेल में कागज कहां मिला? सुनिए, उसे जो दूध दिया जाता था, उसे ढकने के लिए गिलास के ऊपर कागज रखकर मोड़ दिया जाता था। उसी कागज पर बनयन अपनी काव्य रचना किया करता था।


 अब्राहम लिंकन के बारे में

       

एक बालक ने जंगल में लकड़ी काटने में भी अपना अवसर देखा, स्कूल की तो बात ही क्या, उसके पास किताब में जुटाने का भी साधन न था। फिर भी फुरसत के समय वह किताबें मांग- मांग कर पढ़ा करता था। किताबें मांगने के लिए उसे मिलो दूर पैदल जाना पड़ता था। स्वयं अध्ययन करते- करते वह वकील बना और यही नहीं, एक दिन वह अमेरिका का राष्ट्रपति भी बन गया उस व्यक्ति का नाम था, अब्राहम लिंकन


 कैसा चमत्कार है। वह किस प्रकार महान व्यक्ति बन गया। आप भी महान बन सकते हैं। आवश्यकता है कि आप भाग्यवादी न बने, तत्काल कार्य प्रारंभ कर दे। अवसर की प्रतीक्षा न करें, 

वरन् अवसर स्वयं बनाएं। 

       जब आप कहते हैं- 'मेरे लिए कोई अवसर नहीं है, कार्य नहीं कर सकता हूं।'- तब आप भी एक तरह से सहस्त्रों युवक-युवतियों को तोता- रटंन को दोहराते हैं। जो कहते हैं, 'यह असंभव है। मैं इस काम को करने में असमर्थ हूं।' कृपया इन सभी शब्दों को अपने शब्दकोश में से निकाल फेंकिए।


"कंजूस व्यक्ति की कहानी"


 कुछ युवक ऐसे है जो दैनिक पत्र नहीं खरीदते हैं,वे इसके लिए कंजूस बनते हैं,वे अज्ञानी और संकीर्ण - ह्रदय ही रह जाते हैं। कई बातें हैं जिनसे तत्काल जो बचत होती हैं, किंतु अंत में वे दरिद्रता की ओर ले जाती है। बचत ऐसी न होनी चाहिए कि अपने और परिवार के सुख-अराम सफलता का रहस्य को ही तिलांजलि दे दी जाए।




 

हेनरी क्लू ने इस विषय में एक मनोरंजन किस्सा सुनाया है-

"एक व्यक्ति की पत्नी को फोटो खिंचवाने की इच्छा थी। यह इच्छा कुछ अंशों में तो निर्दोष इच्छा थी, परंतु इसका मूल कारण सनक ही था। वह चाहती थी कि बाद में उसके बच्चे उसे यौवन और सौंदर्यमय रूप में देख सके और स्मरण कर सके, परंतु उसका पति बड़ा सख्त कंजूस था। वह उस महिला की इच्छा को निरंतर टालता रहा। अंत में उसे उस इच्छा को तब पूरा करना पड़ा जबकि ऐसा करना अनिवार्य हो गया। परंतु जिस समय वह उसके लिए पैसा खर्च करने को तैयार हुआ, उस समय वह सुंदर न रह गई थी।




 वह महिला अपनी निराशा को चुपचाप सहन करती रही। उसके मन की यह निराशा तिल से ताड़ बनती चली गई और अंत में दोनों का पारस्परिक विरोध इतना बढ़ गया कि दोनों ने तलाक ले लिया और इस प्रकार एक परिवार छिन्न- भिन्न हो गया, केवल मितव्ययिता के नाम पर बलि चढ़ा दिया गया।

   

      इसी प्रकार एक करोड़पति मनुष्य को  हमने देखा है, कि वह अपने अध्ययन कक्ष में जितनी बार उठकर जाता था। उतनी ही बार बत्ती बुझा देता था। और हमने एक अन्य करोड़पति को देखा जो अपने कमरे में इतनी तेज रोशनी रखता था, कि दिन का प्रकाश सा प्रतीत होता था।

हमने उससे हंसी से कहा इतना प्रकाश क्यों कर रखा है? उत्तर में उसने कहा कि आंखें खराब होने पर बहुत अधिक उनकी चिकित्सा पर व्यय करने की अपेक्षा प्रकाश पर कुछ अधिक पैसा व्यय करना हितकर होगा।




SOURCE:- HASTE HASTE JEENA SIKHO


Tuesday, August 11, 2020

"सफलता का रहस्य"

         


 यदि आप एक सफल व्यापारी बनना चाहते हैं, तो पहले छोटी -सी दुकान खोलकर देखिए। अपनी योग्यता और क्षमता के बल पर इसे ही एक बड़े व्यापार का रूप दीजिए। इसी प्रकार कुछ भी बनना चाहते हैं, पहले उसका एक छोटा अंश क्रियात्मक रूप में करके देखिए।एकाएक छलांग लगा देने या संपूर्ण पूंजी दाव पर लगा देने पर आप खतरे में पड़ सकते हैं।


 एक करोड़पति बाप के बेटे ने अपने पिता से कहा कि वह साइकिल बनाने का एक बड़ा कारखाना खोलना चाहता है।

        पिता का जवाब था, "ठीक है! पहले तुम साइकिल मरम्मत करने की छोटी- सी दुकान खोल कर चलाकर देख लो। "

         लड़का चकित रह गया, पर पिता का कथन एकदम सही था। वह पहले अपने बेटे को साइकिल सुधारने में निपुण बना देना चाहता था।


 यह छोटा- सा काम जब तक उनका लड़का सीख न ले, तब तक वह साइकिल बनाने का कारखाना खोलना ठीक नहीं समझते थे।

        


यही उन्नति का मूल मंत्र है।

         

सफलता का यही रहस्य है। छोटे रूप में आप अपने लक्ष्य की ओर बढे।इस प्रकाश क्रमशः अनुभव प्राप्त करते हुए निश्चित रूप से बड़ी सफलता को प्राप्त कर सकते हैं।


कार्लाइल का कथन है, छोटे-छोटे नालो को पार करने के बजाय क्या एक बड़ी नदी छलांग में पार कर सकते हैं? हरगिज़ नहीं, तो पहले मामूली काम कर देखिए।तब आगे बढिये। मनुष्य वही है, जो सावधानी के साथ छोटे स्तर पर काम शुरू कर उसे विशाल रूप देता है।


Tuesday, August 4, 2020

"हम असली खुशी बदल नहीं सकते"

 


  रामलाल नामक इंसान की पत्नी पहली बार मायके जा रही थी। पत्नी ने सोचा, 'मैं पहली बार मायके जा रही  हूं तो क्यों ना कुछ नया खरीद कर अपने साथ ले जाऊं, कोई साड़ी ,कोई ड्रेस ।अपनी इस सोच को हकीकत में बदलने के लिए उसने अपने पति से इस विषय पर बात की। रामलाल ने जब उसे खरीददारी

करने की इजाजत दे दी तब उसकी पत्नी ने नए उपहार की जीद की और कहा 'मुझे सोने का हार मिल जाय तो मायके में मेरी बहुत तारीफ होगी।

' इतने पैसे तो मेरे पास नहीं है अब मैं क्या करूं रामलाल ने कहा।'

रामलाल की पत्नी ने कहा, 'मेरी जो दो सोने की चूड़ियां है, उन चूड़ियों को बेचकर तुम हार खरीद कर ले आओ। अपनी पत्नी के कहने पर रामलाल दो सोने की चूड़ियाँ लेकर सुनार के पास गया। सुनार ने कहा,' सिर्फ दो चूड़ियाँ से थोड़े ही हार बनता है? उसके लिए तो बहुत सोना चाहिए। यह सुनकर रामलाल सोच में पड़ गया कि 'अब मैं क्या करूं?' तब सुनार ने उसे कुछ नकली हार दिखाये, जो असली लगते थे, सोने के जैसे लगते थे। सुनार ने कहा, फिलहाल तुम इससे काम चलाओ।' इस पर रामलाल मान गया और कहा,' ठीक है।' इस तरह उसी पैसे से वह बढ़िया  सा असली लगने वाला एक नकली हार लेकर घर आया। उसने घर आकर पत्नी को हकीकत बतायी कि 'यह हार नकली है, मगर अभी तुम इससे काम चलाओ, मायके जाकर आओ, आगे चलकर मै तुम्हें असली हार भी खरीद कर दूंगा।

https://www.blogger.com/u/1/blog/post/edit/8683159200098971195/2829829753085266576

 पत्नी  ने रामलाल की मजबूरी समझते हुए कहा, 'ठीक है।' वह खुद समझदार थी इसलिए मान गयी। वह नकली हार पहन कर मायके में गयी। वहां उसने सबको बताया कि उसका हार असली है क्योंकि शान में कमी नहीं होनी चाहिए।

मायके मैं उसकी भाभी भी थी। उसने अपनी ननद का हार देखा, उसे वह हार बहुत पसंद आया। उसने अपने पति श्यामलाल से वैसे ही हार की मांग की। पति ने कहा 'ठीक है।' वह भी सुनार के पास गया। फिर सुनार ने उससे कहा, 'देखो आज कल नकली  का जमाना है, बहुत चलता है, नकली हार लेकर देखो, शायद तुम्हारी पत्नी को पसंद आ जाय।' इस तरह श्यामलाल ने भी पैसे कम होने की वजह से लगभग वैसा ही दिखता हुआ नकली हार पसंद किया। वह हार लेकर घर आया। उसने भी पत्नी को हकीकत बतायी कि 'देखो यह नकली हार है, मगर फिलहाल तुम्हारा काम हो जायेगा, तुम्हें मेरी बहन को देख- देखकर जो जलन होती थी,  वह तो अब नहीं होगी। इस पर उसकी पत्नी भी मान गई और कहा 'ठीक है।'

 एक दिन रामलाल की पत्नी नहाने गयी तो भाभी ने हार बदल दिया और यह सोचकर बड़ी खुश हो गयी की कि 'अब मेरे पास असली हार आ गया। दूसरे दिन रामलाल की पत्नी ने यह सोचकर कि उसकी भाभी का हार असली है, मौका देखकर हार बदल लिया। इसे भी यह लगा कि मेरे पास असली हार है। इस तरह दोनों जिंदगी भर इसी भ्रम में थी, कि मेरे पास असली हार है। मगर आप जानते हैं, कि वे दोनों हमेशा नकली हार पहनकर जीती रही। उनका पूर्ण जीवन एक अवास्तविक खुशी को प्राप्त करने में खत्म हो गयी।


 यह उदाहरण पढ़कर आप सबको लगा होगा। कि कितनी मुर्ख थी, 'वे दोनों' मगर कई लोगों का जीवन भी ऐसा ही झूठी  खुशी प्राप्त करने में खत्म हो जाती है।



SOURCE: HASTE HASTE JEENA SIKHO


मैं ही गरीब क्‍यों? भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

क्यों पढ़े - आजकल के दौर में अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मैं ही गरीब क्यों। मैं ही दूसरों से कमजोर क्यों हूँ? उन...