Saturday, September 26, 2020

"सफलता की हर कहानी महान असफलताओं की भी कहानी है"

 

अगर हम इतिहास पढे, तो पाएँगे कि सफलता की हर कहानी के साथ महान असफलताएँ भी जुड़ी हुई है। लेकिन लोग उन असफलताओं पर ध्यान नहीं देते। वे केवल नतीजों को देखते हैं, और सोचते हैं कि उस आदमी ने क्या किस्मत पाई है, "वह सही वक्त पर, सही जगह रहा होगा।"

     

Add caption
टॉम वाट्सन सीनियर (Tom Watson Sr.) का कहना, "अगर आप सफल होना चाहते हैं, तो अपनी असफलता की दर दूनी कर दीजिए।"

      एक आदमी की जिंदगी की कहानी बड़ी मशहूर है।यह आदमी 21 साल की उम्र में व्यापार में नाकामयाब हो गया; 22 साल की उम्र में वह एक चुनाव हार गया; 24 साल की उम्र में उसे व्यापार में फिर से और सफलता मिली;


26 साल की उम्र में उसकी पत्नी मर गई; 27 साल की उम्र में उसका मानसिक संतुलन(nervous breakdown) बिगड़ गया; 34 साल की उम्र में वह कांग्रेस का चुनाव हार गया; 45 साल की आयु मैं उसे सीनेट के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा; 47 साल की उम्र में वह उपराष्ट्रपति बनने में असफल रहा; 49 साल की उम्र आयु में उसे सीनेट के एक और चुनाव में नाकामयाबी मिली;


और वही आदमी 52 साल की उम्र में अमेरिका का राष्ट्रपति चुना गया। वह आदमी अब्राहम लिंकन था।




       क्या आप लिंकन को असफल मानेंगे? वह शर्म से सिर झुका कर मैदान से हट सकते थे, और अपनी वकालत फिर शुरू कर सकते थे। लेकिन लिंकन के लिए हार केवल भटकाव थी, सफर का अंत नहीं।


Wednesday, September 23, 2020

"स्वार्थ और लालच"


एक लालची किसान से कहा गया कि वह दिन में जितनी जमीन पर चलेगा, वह उसकी हो जाएगी, बशर्ते वह सूरज डूबने तक शुरू करने की जगह पर वापस लौट आए। ज्यादा से ज्यादा जमीन पाने के लिए वह किसान दूसरे दिन सूरज निकलने से पहले ही निकल पड़ा। वह काफी तेज चल रहा था क्योंकि वह ज्यादा से ज्यादा जमीन हासिल करना चाहता था। थकने के बावजूद वह सारी दोपहर चलता रहा, क्योंकि वह जिंदगी में दौलत कमाने के लिए हासिल हुए उस मौके को गँवाना नहीं चाहता था।



  दिन ढलते वक्त उसे वह शर्त याद आई कि उसे सूरज डूबने से पहले शुरुआत की जगह पर पहुँचना है। अपनी लालच की वजह से वह उस जगह से काफी दूर निकल आया था। वह वापस लौट पड़ा। सूरज डूबने का वक्त ज्यों -ज्यों करीब आता जा रहा था, वह उतनी ही तेजी से दौड़ता जा रहा था। वह बुरी तरह थक कर हाँपने लगा,फिर भी वह बर्दाश्त से अधिक तेजी से दौड़ता रहा। नतीजा यह हुआ कि सूरज डूबते डूबते वह शुरुआत वाली जगह पर पहुँच तो गया, पर उसका दम निकल गया, और वह मर गया। उसको दफना दिया गया, और उसे दफन करने के लिए जमीन के बस एक छोटे से टुकड़े की ही जरूरत पड़ी। 



     इस कहानी में काफी सच्चाई और एक सबक छुपा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसान अमीर था, या गरीब। किसी भी लालची आदमी का ऐसा ही हश्र होता है।


"मन में मेल ना रखें"


जिम औंर जेरी बचपन के दोस्त थे,मगर किसी कारण से उनकी दोस्ती में दरार पड़ गई। वे 25 साल तक एक -दूसरे से नहीं बोले। जेरी मृत्युशय्या पर पड़ा था और दिल पर बोझ लेकर मारना नहीं चाहता था। इसलिए उसने जिम को बुलाया और माफी माँगते हुए कहा, "हम एक -दूसरे को क्षमा कर दें और पिछली बातों को भूल जाएँ।" जिम को भी यह बात अच्छी लगी। एक दिन उसने जेरी से अस्पताल जाकर भेंट करने का फैसला किया।


उन्होंने बीते पिछले 25 साल सालों को याद किया, अपने मतभेदों को भुलाया और कुछ घंटे साथ गुजारे। जब जिम जाने वाला था, जेरी पीछे से चिल्लाकर बोला, "जिम, अगर मैं नहीं मरा तो याद रखना, यह माफी मानी नहीं जाएगी।" द्वेष भाव रखने के लिए जीवन बहुत छोटा है। द्वेष रखना व्यर्थ है।   

    जहाँ एक तरफ द्वेष रखना अच्छी बात नहीं,वही बार-बार चोट खाना भी अच्छी बात नहीं है। किसी ने ठीक ही कहा है, "तुम मुझे एक बार धोखा देते हो, तो तुम पर लानत है, तुम मुझे दोबारा धोखा देते हो, तो मुझ पर लानत है।

     जॉन केनेडी (John Kennedy) ने एक बार कहा था,किसी को माफ तो कर दो, लेकिन उसका नाम मत भूलो। मैं निश्चित ही कर सकता हूं कि उनका मतलब यह था कि दोबारा ठगा जाना या धोखा खाना अकलमंद नहीं है।


Source - Jeet Aapki

Monday, September 21, 2020

सही वक़्त पर सही निर्णय लेना कितना ज़रूरी होता है?


शंकर नाम का एक लड़का था। एक दिन रास्ते में चलते समय वह एक सेप्टिक टैंक में गिर गया। वह एक अच्छा तैराक है, लेकिन टैंक से बाहर निकलने के लिए बहुत गहरा था। अब वह पूरी गंदगी से आच्छादित था और उससे बहुत बदबू रही थी। अचानक वह जोर से चिल्लाने लगाफायर! आग! आग!"



आग के पुकार से सतर्क होने के कारण उपरोक्त सभी लोग भयभीत होने लगे और डर के मारे किसी ने फायर ब्रिगेड को फोन किया। कुछ ही समय में फायर ब्रिगेड की एक बड़ी गाड़ी अपने सायरन बजाते हुए जाती है। वहां कोई आग का नहीं पता चलता है हर जगह खोजते हुए वे सेप्टिक टैंक में शंकर को "फायर !" चिल्लाते हुए पाते हैं। वे सीढ़ियां बिछाकर उसे बाहर निकालते हैं। अपने कपड़ों पर पूरी गंदगी के साथ वह बाहर निकलता है और राहत की सांस लेता है। उसकी ऐसी शरारत के कारण सभी लोग गुस्से मे उससे पूछते हैं कि उसने मदद के लिए चिल्लाया क्यों नहीं ? तो इस पर वह कहता है कि-


"अगर मैं मल! मल! शिट्ट! शिट्ट! चिल्लाया होता तो किसी को कोई फर्क भी नहीं पडता और कोई देखता भी नहीं था इसीलिए मैं आग! आग! आग! करके चिल्लाया"

सही समय और सही निर्णय का तालमेल मे रहना लाभ के लिए अनिवार्य है।

 

"मुँह से निकले शब्द वापस नहीं लिए जा सकते"

 


 एक किसान ने अपने पड़ोसी की निंदा की। अपनी गलती का अहसास होने पर वह पादरी के पास क्षमा माँगने गया। पादरी ने उससे कहा कि वह पंखों से भरा एक थैला शहर के बीचो-बीच बिखेर दे। किसान ने वही किया, फिर पादरी ने कहा  की जाओ और सभी पंख थेले में भर लाओ।


किसान ने ऐसा करने की बहुत कोशिश की, मगर सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ गए थे। जब वह खाली थैला लेकर लौटा, तो पादरी ने कहा कि यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है। तुमने बात तो आसानी से कह दी, लेकिन उसे वापस नहीं ले सकते, इसीलिए शब्दों के चुनाव में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।


Wednesday, September 16, 2020

"मुँह से निकले शब्द वापस नहीं लिए जा सकते"


 एक किसान ने अपने पड़ोसी की निंदा की। अपनी गलती का अहसास होने पर वह पादरी के पास क्षमा माँगने गया। पादरी ने उससे कहा कि वह पंखों से भरा एक थैला शहर के बीचो-बीच बिखेर दे। किसान ने वही किया, फिर पादरी ने कहा  की जाओ और सभी पंख थेले में भर लाओ। किसान ने ऐसा करने की बहुत कोशिश की, मगर सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ गए थे। जब वह खाली थैला लेकर लौटा, तो पादरी ने कहा कि यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है। तुमने बात तो आसानी से कह दी, लेकिन उसे वापस नहीं ले सकते, इसीलिए शब्दों के चुनाव में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।

SOURE-JEET APKI

Tuesday, September 15, 2020

" आसान रास्ता काफी मुश्किल रास्ता साबित हो सकता है"

 



 एक बार एक लार्क(Lark) चिड़िया जंगल में गाना गा रही थी। तभी, एक किसान उसके पास से कीड़ों से भरा एक संदूक लेकर गुजरा। लार्क चिड़िया ने उसे रोककर पूछा, "तुम्हारे संदूक में क्या है, और तुम कहाँ जा रहे हो?" किसान ने जवाब दिया कि उस संदूक में कीड़े हैं।,वह बाजार से उन कीड़ों के बदले पंख खरीदने जा रहा है। लार्क ने कहा, "पंख तो मेरे पास भी है। मैं अपना एक पंख तोड़ कर तुम्हें दे दूंगी,



इससे मुझे कीडे नहीं तलाशने पड़ेंगे।" किसान ने लार्क को कीड़े दे दिए, और लार्क ने बदले में उसे अपना एक पंख तोड़ कर दे दिया। उसके बाद रोज यही सिलसिला चलता रहा, और एक ऐसा दिन भी आया, जब लार्क के पास देने के लिए कोई पंख ही नहीं बचा था। वह उड़ कर कीड़े तलाशने लायक नहीं रह गई। वह भद्दी दिखने लगी, और उसने गाना छोड़ दिया। जल्दी ही वह मर गई।

 यही बात हमारी जिंदगी के लिए भी सच है। कई बार हमें जो रास्ता आसान लगता है, वहीं बाद में मुश्किल साबित होता है।                   

      इस कहानी का संदेश बहुत ही साफ है। लार्क को जो भोजन हासिल करने का आसान तरीका लग रहा था, वही मुश्किल और नुकसानदेह तरीका साबित हुआ।



Source - Jeet Aapki

"छोटी-छोटी बातें बड़ा फर्क डालती है"




एक आदमी सुबह को समुंद्र के किनारे टहल रहा था। उसने देखा कि लहरो के साथ सैकड़ों स्टार मछलियाँ तट पर आ जाती है, जब लहरें पीछे जाती है तो मछलियाँ किनारे पर ही रह जाती है, और धूप से मर जाती है।


लहरें उसी समय लौटी थी, और स्टार मछलियाँ अभी जिवित थी। वह आदमी कुछ कदम आगे बढ़ा, उसने एक मछली उठाई और पानी में फेंक दी। वह ऐसा बार-बार करता रहा।

उस आदमी के  ठीक पीछे एक और आदमी था, जो यह नहीं समझ पा रहा था कि वह क्या कर रहा है। वह उसके पास आया, और पूछा, "तुम क्या कर रहे हो? यहाँ तो सैकडों स्टार मछलियाँ है।

तुम कितने को बचा सकोगे? तुम्हारे ऐसा करने से क्या फर्क पड़ेगा?" उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया, दो कदम आगे बढ़कर उसने एक और मछली को उठाकर पानी में फेंक दिया, और बोला, "इससे इस एक मछली को तो फर्क पड़ता हैं।"


 हम कौन -सा फर्क डाल रहे हैं? बड़ा या छोटा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर सब लोग थोड़ा -थोड़ा फर्क लाएँ,  तो बहुत बड़ा फर्क पड़ेगा।


Source- जीत आपकी


"अपने लक्ष्य को बनाना"



जीवन के रास्तों पर चलते हुए अपनी आँखें अपने लक्ष्य पर जमाए रहे।आम पर ध्यान दें, गुठली पर नहीं।

                                          - अज्ञात


 ज्ञान आपको मंजिल तक पहुँचने में मदद करता है, बशर्ते कि आपको अपनी मंजिल का पता हो।


 प्राचीन भारत में एक ऋषि अपने शिष्यों को तीरंदाजी की कला सिखा रहे थे। उन्होंने लक्ष्य के रूप में एक लकड़ी की चिड़िया रखी, और अपने शिष्यों से उस चिड़िया की आँख पर निशाना लगाने को कहा। उन्होंने पहले शिष्य से पूछा, "तुम्हें क्या दिख रहा है?" शिष्य ने कहा, "मैं पेड़, टहनियाँ, पत्ते, आकाश, चिड़िया और उसकी आँख देख रहा हूँ।"



ऋषि ने उस शिष्य को इंतजार करने को कहा। तब उन्होंने दूसरे शिष्य से वही सवाल किया, तो दूसरे शिष्य ने जवाब दिया, "मुझे सिर्फ चिड़िया की आँख दिखाई दे रही है।" तब ऋषि ने कहा, "बहुत अच्छा, अब तीर चलाओ।" तीर सीधा जाकर चिड़िया की आँख में लगा।

 


    अगर हम अपने मकसद पर ध्यान नहीं लगाएँगे, तो अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाएँगे। अपने मकसद पर ध्यान लगाना एक मुश्किल काम है, मगर यह एक कला है, जिसे सीखा जा सकता है।


Source - जीत आपकी


Saturday, September 12, 2020

"अपनी कमियों को खूबियों में बदलें"




          

  ऐसे लोगों की जीवनी पढे, जिन्होंने निराशा को आशा में, नुकसान को फायदे में, रास्ते के पत्थरों को सफलता की सीढ़ी में बदल दिया हो। ऐसे लोग दुखी और उदास होने से इंकार कर देते हैं। वे मायूसियो और नाकामयाबियो को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते।

            

 "विल्मा रूडोल्फ की कहानी" 



विल्मा रूडोल्फ का जन्म टेनेसेसी के एक गरीब परिवार में हुआ था। चार साल की उम्र में उसे डबल निमोनिया और काला बुखार ने गंभीर रूप से बीमार कर दिया। इनकी वजह से उसे पोलियो हो गया। वह पैरों को सहारा देने के लिए ब्रैस(brace) पहना करती थी। डॉक्टरों ने तो यहाँ तक कह डाला था कि वह जिंदगी भर चल- फिर नहीं सकेगी। लेकिन विल्मा की मां ने उसकी हिम्मत बढ़ाई और कहा कि ईश्वर की दी हुई क्षमता, मेहनत और लगन से वह जो चाहे कर सकती है। यह सुनकर विल्मा ने कहा कि वह इस दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना चाहती है।



नौ साल की उम्र में डॉक्टरों के मना करने के बावजूद विल्मा ने ब्रैस  को उतार कर पहला कदम उठाया, जबकि डॉक्टरों ने कहा था कि वह कभी चल नहीं पाएगी। 13 साल की होने पर उसने अपनी पहली दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और सबसे पीछे रही।



उसके बाद वह दूसरी, तीसरी, चौथी दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती रही और हमेशा आखिरी स्थान पर आती रही। वह तब तक कोशिश करती रही, जब तक वह दिन नहीं आ गया, जब वह फर्स्ट आई।

         15 साल की उम्र में विल्मा टेनेंसी स्टेट यूनिवर्सिटी(Tennessee State University) गई, जहाँ वह  एड टेंपल(Ed Temple) नाम के कोच से मिली। विल्मा ने उन्हें अपनी यह ख्वाहिश बताई की "मैं दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना चाहती हूँ।" तब टेंपल ने कहा, "तुम्हारी इस इच्छाशक्ति की वजह से तुम्हें कोई भी नहीं रोक सकता और साथ में मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा।"


        आखिर वह दिन आया जब विल्मा ने ओलंपिक में हिस्सा लिया। ओलंपिक में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में मुकाबला होता है। विल्मा का मुकाबला जूत्ता हैन(Jutta Heine) से था, जिसे कोई भी हरा नहीं पाया था। पहली दौड़ 100 मीटर की थी। इसमें विल्मा ने जुत्ता को हराकर अपना पहला गोल्ड मेडल जीता। दूसरी दौड़ 200 मीटर की थी। इसमें विल्मा ने जुत्ता को दूसरी बार हराया और उसे दूसरा गोल्ड मेडल मिला। तीसरी दौड़ 400 मीटर की रिले रेस थी और विल्मा का मुकाबला एक बार फिर से जूत्ता से ही था। रिले में रेस का आखिरी हिस्सा टीम का सबसे तेज एथलीट ही दौड़ता है।


इसीलिए विल्मा और जूत्ता, दोनों को अपनी-अपनी टीमों के लिए दौड़ के आखिरी हिस्से में दौड़ना था। विल्मा की टीम के तीन लोग रिले रेस के शुरुआती तीन हिस्से में दौड़े और आसानी से बेटन बदली। जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई, उसके हाथ से बेटन ही छूट गई।



लेकिन विल्मा  ने देख लिया कि दूसरे छोर पर जूत्ता हैन तेजी से दौड़ चली है।विल्मा ने गिरी हुई बेटन उठाई और मशीन की तरह ऐसी तेजी से दौड़ी की जूत्ता को तीसरी बार भी हराया और अपना तीसरा गोल्ड मेडल जीता। यह बात इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई कि एक लकवाग्रस्त महिला 1960 के ओलंपिक में दुनिया की सबसे तेज धाविका बन गई।



       विल्मा से हमें क्या सीखना चाहिए?  इससे हमें शिक्षा मिलती है कि कामयाब लोग कठिनाईयों के बावजूद सफलता हासिल करते हैं न कि तब जब कठिनाईयाँ  नहीं होती।

       जब हम किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी सुनने या पढ़ते हैं, जिसने अपनी कमियों को खूबियों में बदल दिया हो, तब क्या हम उत्साहित नहीं होते? यदि हम ऐसे ही कामयाब लोगों की जीवनी पढे, तो क्या हमारा भी हौसला नहीं बढ़ेगा?


Thursday, September 10, 2020

"बच्चे की परवरिश करना लोकप्रिय प्रतियोगिता नहीं है"


    एक डकैती के मुलजिम को सजा देते समय जज ने उससे पूछा कि क्या उसे कुछ कहना है? उस आदमी ने जवाब दिया, "जी हजूर। मेहरबानी करके मेरे मां-बाप को भी सजा दीजिए।" जज ने पूछा, "क्यों?" कैदी ने जवाब दिया, मेरे माँ -बाप ने यह जानने के बावजुद मुझे कुछ नहीं कहा। उसके बाद मैंने एक पेन चुराई।

उन्होंने उस वाकये को भी जान-बूझकर नजर अंदाज किया। उसके बाद में स्कूल और पड़ोसियों के घरों से एक के बाद "एक चीजें चुराता रहा और चोरी मेरी आदत बन गई। मेरे माँ -बाप को ये सारी बातें मालूम थी, पर उन्होंने मुझे एक शब्द भी नहीं कहा, इसीलिए मेरे साथ उन्हें भी जेल जाना चाहिए।"

      वह सही कह रहा था। हालांकि इन बातों से वह अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं होता, पर सवाल यह पैदा होता है कि क्या माँ -बाप ने सही काम किया? जाहिर है कि 'नहीं'।

        बच्चों को चुनाव करने का मौका देना अच्छी बात है, पर सही दिशा दिखाए बिना चयन करने की छूट देना उसकी तबाही की वजह बन सकता है। शरीर और मन की पूरी तैयारी त्याग और अनुशासन से ही संभव है।                

मां -बाप एक हफ्ते में बच्चों के साथ काम की बातचीत पर तकरीबन 15 मिनट का ही वक्त देते हैं, बाकी समय उन्हें अपने साथियों और टी.वी. से जो नैतिक मूल्य मिलते हैं उन्हें मनचाहे ढंग से इकट्ठे करने के लिए छोड़ दिया जाता है।


Monday, September 7, 2020

"ईमानदार किसान"

  


 

एक किसान एक बेकर(Baker) को रोज एक सेर मक्खन बेचा करता था। एक दिन बेकर ने यह परखने के लिए मक्खन एक सेर है या नहीं, उसे तोला और पाया कि मक्खन कम था। इस बात से वह गुस्सा ह़ो गया और किसान को अदालत मे ले गया। जज ने  किसान से पूछा कि उसने तौलने के लिए किस बाट का इस्तेमाल किया था? किसान ने जवाब दिया "हुजूर, मैं अज्ञानी हूँ। मेरे पास तौलने के लिए कोई सही बाट नही है लेकिन मेरे पास एक तराजू है।" जज ने पूछा, तो तुम मक्खन को कैसे तोलते हो? किसान ने जवाब दिया, "झ्सने मक्खन तो मुझसे अब खरीदना शुरू किया, मैं तो  बहुत पहले से इससे एक सेर ब्रेड खरीद रहा हूं। रोज सुबह जब बेकर ब्रेड लाता है तो मैं ब्रेड को बाट बना कर बराबर का मक्खन तौल कर दे देता हूँ। अगर इसमें किसी का दोष हैं तो वह है बेकर का! जिंदगी मे हमें वही वापस मिलता है, जो हम दुसरों  को देते है।


       हम जब भी कोई काम करें तो खुद से यह सवाल पूछे-  क्या मुझे जो पैसा मिलता है, मैं उसके बराबर की मेहनत भी कर रहा हूं।

       ईमानदारी और बेईमानी एक आदत बन जाती है। कुछ लोग बेईमानी की प्रैक्टिस करते हैं और चेहरे पर जरा -सी भी शिकन लाए बिना बड़ी आसानी से झूठ बोल सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो इतना झूठ बोलते हैं कि सच क्या है, यह भी भूल जाते हैं। मगर वे किसे धोखा दे रहे हैं? किसी और को नहीं, बल्कि खुद को।

        ईमानदारी तहजीब से पेश की जा सकती है। कुछ लोग निर्दयी ढंग से ईमानदारी होने पर गर्व महसूस करते हैं। ऐसा लगता है, कि उन्हें इमानदारी के बजाए उस निर्दयता में ज्यादा आनंद आता है। ईमानदारी बरतने में शब्दों की चुनाव और व्यवहार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

Source-   जीत आपकी

"औरों की परवाह करें"

 




 एक दिन एक दस साल का बच्चा एक आइसक्रीम की दुकान पर गया और टेबल पर बैठ कर एक महिला वेटर से पूछा, "एक कोन(cone) आइसक्रीम कितने की है?" उसने कहा, "पचहत्तर सेंट की।" बच्चा हाथ में पकड़े सिक्कों को गिनने लगा, फिर उसने पूछा की छोटी कप वाली आइसक्रीम कितने की है? वेटर ने बेसब्री से कहा, पैंसठ सेंट्स की।" लड़का बोला, "मुझे छोटा कप दे दो।" लड़का अपना आइसक्रीम खाया, पैसे दिए और चला गया।


जब वेटर खाली प्लेट उठाने के लिए आई तो उसने जो कुछ देखा, वह बात उसके मन को छू गई।  वहाँ  दस सेंट्स 'टिप' के रखे हुए थे। उस छोटे बच्चे  ने उस वेटर का ख्याल किया। उसने संवेदनशीलता दिखाई थी। उसने खुद से पहले दूसरे के बारे में सोचा।


        अगर हम सब एक- दूसरे के लिए उस छोटे बच्चे की तरह सोचे, तो यह दुनिया कितनी हसीन हो जाएगी। दूसरों को ख्याल करें  और नम्रता व शिष्टता दिखाएँ । दूसरों का ख्याल रखना यह दिखाता है कि हम उनकी परवाह करते हैं।


Source-   जीत आपकी

मैं ही गरीब क्‍यों? भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

क्यों पढ़े - आजकल के दौर में अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मैं ही गरीब क्यों। मैं ही दूसरों से कमजोर क्यों हूँ? उन...