Tuesday, October 13, 2020

"परिश्रम का साथी संगीत"

  एक मोची  सूर्योदय के समय अपनी दुकान सड़क के किनारे लगाता था। दिन भर दुकान लगी रहती और वह गा- गाकर काम किया करता। शाम को जब सूरज अस्ताचल की गोद में जाकर छुप जाता, तो उसकी दुकान बढ़ती और वह हंसता हुआ घर की ओर चल देता।


    इस तरह वह पूरा दिन सड़क के किनारे बैठकर बिता देता था। न तो उसे आलस्य आता और ना उसे दिन में नींद आती। उसने संगीत को परिश्रम का साथी बना लिया था। यही कारण था कि उसकी खुशी, उदासी, चिंता और आलस में कभी नहीं बदल पाई। उसके पास आने वाला प्रत्येक ग्राहक भी उससे खुश होकर ही जाता है।


      एक बात और थी कि उस मोची की कमाई बहुत अच्छी होती थी। उसका परिवार भी प्रसन्न रहता था और उसे लगता कि उसके जीवन में कोई भी कमी नहीं है। वह सर्वथा संपन्न और अपने में पूरी तरह खुश है। अब सोचने वाली बात है कि ऐसा क्यों था? इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उसने परिश्रम को संगीत के साथ जोड़ लिया था, तभी काम आवश्यकता से अधिक होता और वह कभी थकता नहीं था।




मैं ही गरीब क्‍यों? भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

क्यों पढ़े - आजकल के दौर में अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मैं ही गरीब क्यों। मैं ही दूसरों से कमजोर क्यों हूँ? उन...