Sunday, July 4, 2021

मैं ही गरीब क्‍यों? भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

क्यों पढ़े - आजकल के दौर में अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मैं ही गरीब क्यों। मैं ही दूसरों से कमजोर क्यों हूँ? उन्हें अपने आप में दूसरों के मुकाबले कमी लगती है वे इसका दोष भगवान को देते हैं उन्हें अपनी स्थिति का कारण ठहराते हैं। इस कहानी में आपको इस प्रश्न का संपूर्ण उत्तर मिल जाएगा और आप अपने जीवन से संतुष्ट भी महसूस करेंगे।

    भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

बहुत समय पहले की बात है एक गाँव में धर्म उपदेश देने के लिए लगे हुए शिविर में भगवान गौतम बुद्ध पहुँचे। गाँव के लोग अपनी-अपनी समस्याएं लेकर उनके पास जाते और उनसे समाधान प्राप्त कर नई ऊर्जा के साथ वापस लौटते।

गाँव के बाहर एक गरीब राह में बैठा, बुद्ध के पास आते-जाते लोगों को निहारता रहता, उसने क्या देखा? “दुखी चेहरा लिए भारी क़दमों से लोग भगवान गौतम बुद्ध के शिविर में जाते और नई ऊर्जा के साथ चेहरे पर खुशी व आंनद लिए वापस लौटते।”

गरीब ने सोचा क्‍यों न मैं भी भगवान के पास अपनी समस्या लेकर जांऊ? यह सोचकर हिम्मत करके वह भी शिविर की ओर चल देता है, शिविर में एक-एक कर क्रमबद्ध तरीके से व्यक्ति को प्रवेश मिलता है, इसलिए वह भी अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा। जो कुछ उसने रास्ते में देखा, अब यहाँ उसे साक्षात्‌ देखने को मिल रहा है। लोग एक-एक कर अपनी समस्याएँ बता रहे थे, भगवान गौतम बुद्ध चुपचाप शांति से सब की समस्या सुनते और जवाब देते। 

उसकी भी बारी

आई उसने भगवान गौतम बुद्ध को प्रणाम किया और बोला- “भगवन्‌ मैं ही गरीब क्यों?” भगवान गौतम बुद्ध मुस्कुराए और बोले- “तुमने कभी किसी को दिया ही नहीं इसलिए गरीब हो।” इस पर वह आश्चर्य से वह भगवान गौतम बुद्ध का मुँह ताकने लगा और बोला “भगवन्‌ मेरे पास कुछ देने के लिए है ही नहीं, बड़ी मुश्किल से गुजारा हो पाता है और कभी-कभी तो भूखे ही सोना पड़ता है इतना गरीब हुँ।”

भगवान गौतम बुद्ध शांत भाव से बोले- “तुम्हारे पास एक चेहरा है किसी को भी मुस्कराहट दे सकते हो, तुम्हारे पास मुँह है किसी को भी प्रशंसा भरे कुछ शब्द दे सकते हो, जो हाथ तुम्हारे पास है किसी की भी मदद कर सकते हो।” दरअसल जिस के पास में ये तीन चीजें हैं, वह भला कैसे गरीब हो सकता है? गरीबी का भाव मन में होता है मन से यह भ्रम निकाल दो। लोगों को देते जाओ गरीबी अपने आप ही दूर हो जाएगी। यह बातें सुनकर उस गरीब का चेहरा दमक उठा। उसे अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका है। अब उसके मन से गरीबी का भाव दूर हो गया।          इस शिक्षा को जीवन में उतार कर कुछ ही दिनों में उसका जीवन भी खुशियों से भर गया।

    जीवन की सीख

मंदिर में भी लोग जाते है तो कुछ न कुछ मांगते रहते है और जीवन भर घुट-घुटकर, रो-रोकर समय बिता देते हैं, वे ईश्वर की कृपाओ को कभी कम समझे ही नहीं। जीवन की महत्वता को कभी जाना ही नहीं। इस पर कबीर दास जी ने बहुत बेहतरीन दोहे कहे है आइए पढ़ते है और समझते है।

“सब के पल्‍ले लाल है सभी साहुकार,

गांठ खोल परखा नहीं, या विधि रहा कंगाल”

यानि सभी के पास ज्ञान है, जो कि ईश्वर की अनमोल देन है।

जिसे हम कभी जानने-समझने की कोशिश ही नहीं की इसलिए हम सुख का आंनद नहीं ले पाते।


मित्रों “मनुष्य जीवन” एक अनमोल अवसर है और विधाता की असीम कृपा का तोहफा है, हमारा सर्वप्रथम यह कर्तव्य होता है कि हम उस परम-परमेश्वर की इनायतों को समझें, ईश्वर की कृपा को जानने की कोशिश करें और इसका सबसे आसान तरीका है खुद को समझना, हमारा अस्तित्व क्या है, हमारा लक्ष्य क्या है, हमारे क्या कर्म है  आदि।

उपरोक्त सभी बातों को पढ़कर आज हम यह पूर्णयता समझ चुके हैं कि हमारे पास ईश्वर की दी हुई वो अनमोल तोहफे है जिनसे आज मानव नई-नई उपलब्धियों को पा रहा है, असीम ऊंचाइयों को छू रहा है। बस जरूरत है तो सही मार्गदर्शन की, जो कि आज से मैं इन बातों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश कर दी है।

आपको बस यह करना है

1. हर रोज अपनी एक कमीं को दूर करो चाहे वह आपका गुस्सा हो या फिर नका‌रात्मक सोच   

2. जब भी कुछ सोचो तो अच्छा सोचो

3. अगर कुछ करना का सोचा है तो तब तक उसके पीछे लगे रहो जब तक कि वह काम हो नहीं जाता


Friday, July 2, 2021

जीवन का सत्य (धनवान सेठ की कहानी)

 हर मनुष्य का जन्म इस धरती पर एक विशेष कारण से होता है। जिसे हम धीरे-धीरे समय के साथ समझते चले जाते हैं। कई लोग अपने इस मानवीय जीवन के सत्य को समझ ही नहीं पाते क्योंकि वे हमेशा नकारात्मक सोच ही रखते हैं। यही अंतर है नकारात्मक और सकारात्मक सोच में, जहाँ नकारात्मक सोच हमारे लिए समस्याँए पैदा करती है वही सकारात्मक सोच हमारे लिए नए अवसर लाती है। आइए हम जीवन के इस सत्य को एक कहानी द्‌वारा समझने की कोशिश करते हैं।

 धनवान सेठ की कहानी 


 एक गांव में एक बहुत बड़ा धनवान व्यक्ति रहता था। लोग उसे सेठ धनीराम कहते थे। उस सेठ के पास प्रचुर मात्रा में धन संपत्ति थी जिसके कारण उसके सगे-संबंधी, रिश्तेदार,भाई-बहन हमेशा उसे घेरे रहते थे वे उन्हीं के राग अलापते रहते थे, सेठ भी उन सभी लोगों की काफी मदद करता था। तभी अचानक कुछ समय बाद सेठ को भंयकर रोग लग गया।

इस भयंकर बीमारी का सेठ ने बहुत उपचार करवाया लेकिन इसका इलाज नहीं हो सका। आख़िरकार सेठ की मृत्यु हो गई। यमदूत उस सेठ को अपने साथ ले जाने के लिए आ गए, जैसे ही यमदूत सेठ को ले जाने लगे तभी सेठ थोड़ी दूर जाकर यमदूतो से प्रार्थना करने लगे कि “मुझे थोड़ा सा समय दे दो, मैं लौटकर तुरंत आता हूँ” दूतों ने उसे अनुमति दे दी।


सेठ लौटकर आया, चारो ओर नज़रे घुमायीं और वापस यमदूतों के पास आकर बोला- “शीघ्र चलिए” यमदूत उसे इस प्रकार अपने साथ चलने के लिए तैयार देखकर चकित रह गए और सेठ से इसका कारण पूछा। सेठ ने निराशा भरे स्वरों में कहा- “मैंने हेराफेरी करके अपार धन एकत्रित किया था,

लोगों को खूब खिलाया-पिलाया और उनकी बहुत मदद भी की, सोचा था कि वो मेरा साथ कभी नहीं छोडेंगे। अब जब मैं इस दुनिया को सदा के लिए छोड़ कर जा रहा हूँ, तो वे सब बदल गए है मेरे लिए दुखी होने के बजाय, ये अभी से मेरी संपत्ति को बांटने की योजना बनाने लगे है किसी को मेरे लिए जरा-सा भी अफसोस नहीं है।”

सेठ की बात सुनकर यमदूत बोले- “इस संसार में प्राणी अकेला ही आता है और अकेला ही जाता है, इंसान जो भी अच्छा या बुरा कर्म करता है उसे इसका परिणाम स्वयं ही भुगतना पड़ता है, हर प्राणी इस सत्य को समझता तो है पर देर से।”

 जीवन की सीख 

हम इस बात को अपने जीवन में भी देख रहे हैं। लोग जीवन के सत्य को भूलकर मानव द्वारा बनाए गए जाल जैसे लालच, रूपए-पैसा, बुराई आदि तले दब गए हैं।

आप जो भोजन ग्रहण करते है वह पेट में 4 घंटे रहता है, जो वस्त्र पहनते है वह 4 महीने रहता है, लेकिन जो ज्ञान आप हासिल करते हैं वह आपके अंतिम सांस तक साथ रहता है और संस्कार बनकर आपकी अगली पीढी तक पहुँचता है, ज्ञान का बीज कभी व्यर्थ नहीं जाता। जो है जितना है सफल करते चलो, सफल करने से ही सफलता मिलती है।

हर व्यक्ति को सकारात्मक तरीके से देखो, सुनो और समझो। हम जितना ज्यादा पढ़ते है, सुनते है, समझते है, हमें अपनी कमियों का उतना ही ज्यादा एहसास होता है और इसी कमी को दूर करके हम सफलता की मंजिल की और अपने कदम बढ़ाते चले जाते हैं।

“क्या लेकर आया था जो क्या लेकर जाएगा,

   कर कुछ ऐसा जाओ कि लोग तुम्हें याद रख जाएगें।”

आपको बस यह करना है

1. कोशिश करो कि गलत काम नहीं करना  

2. किसी चीज को लेकर ज्यादा लालची नही होना है

3. Life को Enjoy करते चलो





Thursday, July 1, 2021

कुछ और पाने की चाह


 एक महल के द्वार पर बहुत भीड लगी हुई थी. भीड बढती ही जा रही थी. और दोपहर से भीड बढनी शुरू हुई थी, अब शाम होने आ गई. सारा गांव ही करीब-करीब उस द्वार पर इकट्ठा हो गया.  क्या हो गया था उस द्वार पर राजमहल के ? एक छोटी-सी घटना हो गई और घटना ऐसी बेबूझ थी कि जिसने सुना वह वहीं खडा होकर देखता रह गया. किसी की कुछ भी समझ में न आ रहा था"

एक भिखारी सुबह-सुबह आया और उसने राजा के महल केसामने अपना भिक्षापात्र फैलाया. राजा ने अपने नौकरों से कहा कुछ दे दो इसे. उस भिखारी ने कहा, एक शर्त पर लेता हूं.  यह भिक्षापात्र उसी शर्त पर कोई चीज स्वीकार करता है जब यह वचन दिया जाए कि आप मेरे भिक्षापात्र को पूरा भर देंगे, तभी मै कुछ लेता हूं.

   राजा ने कहा, यह कौन-सी मुश्किल है, छोटा-सा भिक्षापात्र है, पूरा भर देंगे और अन्न से नहीं स्वर्ण अशर्फियों से भर देंगे. भिक्षुक ने कहा, और एक बार सोच लें, पीछे पछताना न पडे.  क्योंकि इस भिक्षापात्र को लेकर मैं और द्वारों पर भी गया हूं और न-मालूम कितने लोगों ने यह वचन दिया था कि वे इसे पूरा भर देंगे. लेकिन वे इसे पूरा नहीं भर पाए और बाद में उन्हें क्षमा मांगनी पडी.  राजा हंसने लगा और उसने कहा कि छोटा-सा भिक्षापात्र. उसने अपने मंत्रियों को कहा, स्वर्ण अशर्फियों से भर दो. यही घटना हो गई थी, राजा स्वर्ण अशर्फियां डालता चला गया था,


 भिक्षापात्र कुछ ऐसा था कि भरता ही नहीं था.  सारा गांव द्वार पर इकट्ठा हो गया था देखने. किसी को समझ में कुछ भी न पडता था कि क्या हो गया है ? राजा का खजाना चुक गया. सांझ हो गई, सूरज ढलने लगा, लेकिन भिक्षा का पात्र खाली था.  तब तो राजा भी घब
राया, गिर पडा पैरों पर उस भिक्षु के और बोला, क्या है इस पात्र में रहस्य ? क्या है जादू ? भरता क्यों नहीं ? उस भिखारी ने कहा, कोई जादू नहीं है, कोई रहस्य नहीं है, बडी सीधी-सी बात है. 

 एक मरघट से निकलता था, वहा पर एक आदमी की खोपडी मिल गई, उससे ही मैंने भिक्षापात्र को बना लिया. और आदमी कि खोपडी कभी भी किसी चीज से भरती नहीं है, इसलिए यह भी नहीं भरता है.  हम भी ठिक इस भिक्षु के पात्र की तरह ही है, चाहे हम कितना ही क्युं न पाले हम भी कभी भरते नहीं है. क्योंकि हम मन के सहारे जीते है.  हमारी मांगे कभी नहीं भरती चाहे हम कुछ भी कर ले फिर भी कुछ और पाने की चाह बनी रहती हैं.

मैं ही गरीब क्‍यों? भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

क्यों पढ़े - आजकल के दौर में अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मैं ही गरीब क्यों। मैं ही दूसरों से कमजोर क्यों हूँ? उन...