Thursday, June 24, 2021

ढोंगी बिल्ली का षड्यंत्र


 एक वन में एक पेड की खोव में एक चकोर रहता था. उसी पेड के आसपास कईं पेड और थे जिन पर फल व बीज उगते थे. उन फलों व बीजों से पेट भरकर चकोर मस्त पडा रहता.  इसी प्रकार कईं वर्ष बीत गये. एक दिन उडते-उडते एक ओर चकोर सांस लेने के लिए उस पेड की टहनी पर बैठा. दोनो में बातें हई. दूसरे चकोर को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह केवल पेडों के फल व बीज चुग-कर जीवन गुजार रहा था 

     दूसरे चकोर ने उसे बताया भई दुनिया में खाने के लिए केवल फल और बीज ही नहीं होते और भी कईं स्वादिष्ट चीजें है उन्हें भी खाना चाहिए.  खेतों मैं उगने वाले अनाज तो बेजोड होते हैं, कभी अपने खाने का स्वाद बदल कर देखो. दूसरे चकोर के उडने के बाद वह चकोर सोच में पड गया. उसने फैंसला किया कि वह दूर नजर आने वाले खेतों की ओर जायेगा. और उस अनाज नाम की चीज का स्वाद चखकर देखेगा. दूसरे दिन चकोर उडकर एक खेत के पास उतरा खेत में धान की फसल उगी थी

   चकोर ने कोंपले खायी , उसे वह बहुत स्वादिष्ट लगी उस दिन के भोजन में उसे इतना आनन्द आया कि खाकर तृप्त होकर वहीं आंखे मुंदकर सो गया. इसके बाद भी वह वहीं पडा रहा.  रोज खाता पीता और सो जाता. 6-7 दिन बाद उसे सुध आई की घर लौटना चाहिए.

   


 इस बीच एक खरगोष घर की तलाश में घुम रहा था, उस इलाके में जमीन के नीचे पानी भरने के कारण उसका बिल नष्ट हो गया था.  वह उसी चकोर वाले पेड के पास आया और उसे खाली पाकर उसने उस पर अधिकार जमा लिया और वहां रहने लग गया. जब चकोर वापस लौटा तो उसने पाया कि उसके घर पर किसी ओैर का कब्जा हो गया है.

   


 चकोर क्रोधित होकर बोला – ऐं भाई तू कौन है? और मेरे घर में क्या कर रहा है ? खरगोश ने दांत दिखाकर कहा – मैं इस घर का मालिक हूं, मैं सात दिन से यहां रह रहा हूं, यह घर मेरा है.  चकोर गुस्से से फट पडा सात दिन भई मैं इस खो में कईं सालों से रह रहा हूं. किसी भी आसपास के पंछी या चोपाई से पुछ ले.  खरगोश चकोर की बात काटता हुआ बोला – सीधी सी बात है मैं यहां आया यह खोह खाली पडी थी और मैं यहां बस गया. मैं क्यों पडोसीयों से पुछता फिरू ? चकोर गुस्से में बोला – वाह! कोई घर खाली मिले तो क्या, इसका यह मतलब हुआ कि उसमें कोई नहीं रहता.  मैं आखिरी बार कह रहा हूं कि शराफत से कह रहा हूं कि मेरा घर खाली कर दे. खरगोश ने भी उसे ललकारा वरना तू क्या कर लेगा ? यह घर मेरा हैं तुझे जो करना हैं कर ले. चकोर सहम गया.  वह मदद और न्याय की फरियाद लेकर पडोसी जानवरों के पास गया. सबने दिखावा किया परन्तु ठोस रूप से कोई सहायता करने सामने नहीं आया.

   एक बुढे पडोसी ने कहा- ज्यादा झगडा बढाना ठिक नहीं होगा. तुम दोनो आपस में कोई समझौता कर लो. पर समझौते की कोई सुरत नजर नहीं आ रही थी.  अन्त मे लोमडी ने उन्हें सलाह दी तुम किसी ज्ञानी-ध्यानी को पंच बनाकर अपने झगडे का फैसला उससे करवाओं. दोनो को यह सुझाव पसन्द आया. अब दोनो पंच की तलाश में इधर-उधर घुमने लगे. इसी प्रकार घुमते-घुमते वे दोनो एक ही दिन गंगा किनारे आ निकले. 


   वहां उन्हें जप-तप में मगन एक बिल्ली नजर आई. बिल्ली के माथे पर तिलक था, गले में जनेउ, और हाथ मे माला लिये मृगछाला पर बैठी वह पूरी तपस्वीनी लग रही थी.  उसे देखकर चकोर व खरगोष ख़ुशी से उछल पडे. उन्हें भला इससे अच्छा ज्ञानी-ध्यानी और कहां मिलेगा ? खरगोश ने कहा- चकोर जी क्यों न हम इससे अपने झगडे का फैसला करवाये.  चकोर पर बिल्ली का अच्छा प्रभाव पडा था. पर वह जरा घबराया हुआ था. चकोर बोला- मुझे कोई आपत्ति नहीं हैं, पर हमें जरा सावधान रहना चाहिए. खरगो पर तो बिल्ली का जादू चल गया था उसने कहा – अरे नहीं यह बिल्ली सांसारिक मोहमाया त्याग कर तपस्वीनी बन गई है.  सच्चाई तो यह थी कि बिल्ली उन जैसे मूर्ख जीवों को फांसने के लिए भक्ति का नाटक कर रही थी. फिर चकोर और खरगोष पर और प्रभाव डालने के लिए वह जोर-जोर से मंत्र पढने लगी.

 


  खरगोष और चकोर ने उसके निकट आकर और हाथ जयकारा लगाया – जय मातादी. माता को प्रणाम! बिल्ली ने मुस्कुराते हुए धीरे से अपनी आंखें खोली और आशीर्वाद दिया-आयुष्मान भवः।  तुम दोनो के चेहरों पर चिंता की लकीरें है. क्या कष्ट हैं तुम्हें बच्चों ? चकोर ने विनती की माता हम दोनों के बीच एक झगडा है.  हम चाहते हैं कि आप उसका फैसला करें. बिल्ली ने पलकें झपकाई हरे राम , हरे राम तुम्हें झगडना नहीं चाहिए. प्रेम और शान्ति से रहो. उसे उपदेश दिया और बोली – खैर बताओं तुम्हारा झगडा क्या है?  चकोर ने मामला बताया, खरगोष ने अपनी बात कहने के लिए मूंह खोला ही था कि बिल्ली ने पंजा उठाकर उसे रोका और बोली- बच्चों मैं काफी बुढी हूं। ठीक से सुनाई नहीं देता, आंखे भी कमजोर है,  इसलिए तुम दोनो मेरे निकट आकर मेरे कान में जोर से अपनी-अपनी बात कहों ताकि मैं झगडे का कारण जान सकूं. और तुम दोनो को न्याय दे सकूं. 

    जय सियाराम. वे दोनो भक्तिन बिल्ली के बिलकुल निकट आ गये ताकि उसके कानों में अपनी-अपनी बात कह सकें.  बिल्ली को इसी अवसर की तलाश थी. उसने म्याउं की आवाज लगाई और एक ही झपट्टे में खरगोश और चकोर का काम तमाम कर दिया. फिर वह आराम से उन्हें खाने लगी.

Tuesday, June 22, 2021

सिकंदर की कहानी

 


सिकंदर के सिपाहियों ने लूटेरों के सरदार को अथक प्रयास कर आखिर में पकड़ ही लिया और उसके सामने पेश किया. सिकंदर यह देख कर हस्तप्रद रह गया की उस सरदार के चेहरे पर डर का निशान तक नहीं 
था.  

   


       वह बिलकुल निडर हो कर सिकंदर के सामने खड़ा था. लूटेरों के सरदार से वह बोला, ‘यदि तुम चाहो तो माफ़ी मांगकर मुक्त हो सकते हो. वरना तुम्हें भोले-भाले लोगों को लूटने के इल्जाम में सजा भुगतनी पड़ेगी .’  निर्भीक सरदार बोला, मुझे मौत का कतई भय नहीं है. जो आया है, उसे एक-न-एक दिन इस संसार से जाना ही पड़ेगा. फिर एक लूटेरे का दूसरे लूटेरे को दंड देना या क्षमा करने का हक़ ही क्या है ?’  

      सिकंदर ने चौंक-कर पूछा, ‘क्या में तुम्हें लूटेरा नजर आता हूँ ?’ लूटेरे सरदार ने प्रत्युत्तर देते हुए कहा, ‘इसमे क्या शक है ? यदि में राह चलते लोगों को लूटता हूँ तो तुम भी तो राज्यों को लूटते हो.  जो कार्य में लघु स्तर पर करता हूँ, वही कार्य तुम व्यापक स्तर पर करते हों. यदि कोई अंतर है तो वह यह की तुम आजाद हो और में कैदी.’ इतना सुनकर सिकंदर निरुत्तर हो गया और लूटेरे सरदार को मुक्त कर दिया. 

      आज भी इस ज़माने में यही हो रहा हैं, पाप सब कर रहे हैं, भेद सिर्फ मात्रा का हैं.   हम सत्य को कैसे जान सकते हैं. दिया तलें अंधेरा, दिया चाहें उसके पास की जगह को चमका दें लेकिन उसके निचे ही अंधेरा होता हैं. वह खुद अंधेरे में होता हैं.

Sunday, June 20, 2021

युधिष्ठर ने ही समझा उपदेश का सही मर्म


  यह उस समय की बात है जब Kaurava pandav 
गुरु द्रोण के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे | एक दिन गुरु द्रोण ने अपने सभी शिष्यों को एक सबक दिया- ‘ सत्यम वद ‘ मतलब सत्य बोलो |  उन्होंने सभी शिष्यों से कहा की इस पाठ को भली भांति याद कर लें, क्योंकि उनसे यह पाठ कल पूछा जाएगा | अध्यापन काल समाप्त होने के बाद सभी शिष्य अपने-अपने कक्षों में जाकर पाठ याद करने लगे | 

अगले दिन पून: जब सभी शिष्य एकत्रित हुए तो गुरु द्रोण ने सबको बारी-बारी से खड़ा कर पाठ सुनाने के लिए कहा | सभी ने गुरु द्रोण के सामने एक दिन पहले दिया गया शब्द दोहरा दिया, लेकिन युधिष्ठर चुप रहे | गुरु के पूछने पर उन्होंने कहा की वे इस पाठ को याद नहीं कर पाये हैं |  इस प्रकार 15 दिन बीत गए, लेकिन युधिष्ठर को पाठ याद नहीं हुआ | 16 वें दिन उन्होंने गुरु द्रोण से कहा की उन्हें पाठ याद हो गया हैं और वे उसे सुनाना चाहते हैं | द्रोण की आज्ञा पाकर उन्होंने
‘ सत्यम वद ‘ बोलकर सुना दिया 

   


 गुरु ने कहा-युधिष्ठर, पाठ तो केवल दो शब्दों का था | इसे याद करने में तुम्हें इतने दिन क्यों लगें ?  युधिष्ठर बोले- गुरुदेव, इस पाठ के दो शब्दों को याद करके सुना देना कठिन नहीं था, लेकिन जब तक में स्वयं आचरण में इसे धारण नहीं करता, तब तक कैसे कहता की मुझे पाठ याद हो गया है |  

      सच ही है की उपदेश का मर्म वही समझता है जो उसे धारण करना जानता हैं | वाणी के साथ आचरण का अंग बन जाने वाला ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है और इसे धारण करने वाला सच्चा ज्ञानी हैं | लेकिन आज के समय में तो सिर्फ पढ़ा जाता हैं अमल नहीं किया जाता |  कितने सारे लोग है, लगभग सभी ने भगवद गीता पढ़ी होगी, लेकिन युधिष्ठिर की तरह नहीं केवल ऊपर से पढ़ी होगी, शब्द-शब्द पढ़े होंगे |

      जरा सोचिये अगर आज के लोगों ने सच में गीता को पढ़ा होता तो आज जो हमारे मानव समाज की स्थिति हैं क्या ऐसी होती, बात सिर्फ हिन्दू धर्म की नहीं है | सभी धर्म में यही हो रहा हैं, सभी लोगों ने धर्म को ऊपर-ऊपर पढ़ा हैं, लेकिन उसे जाना नहीं | और जब तक आप किसी चीज़ को जान नहीं लेते तब तक आपका उसे पढ़ना व्यर्थ हैं |  


      आप ही सोचिये गीता-कुरान इन सब में लिखा हुआ होता हैं की इनको पढ़ने पर मोक्ष प्राप्त होता हैं | लेकिन लग भग सभी लोग गीता-कुरान पढ़ते हैं फिर उन्हें मोक्ष क्यों नहीं होता, सीधी सी बात हैं क्यूंकि वो सिर्फ पढ़ते हैं, अमल नहीं करते उन बातों पर, अपने जीवन में नहीं ढालते उन बातों को जो की गीता-कुरान में बताई जाती हैं | 

       तो दोस्तों मेरा निवेदन हैं की आप जो भी पढ़ें, उसे सिर्फ पढ़ने तक ही सिमित न रहने दें उसे अपने जीवन में उतारें, उसे अमल करें, मानो मत  मानो  |

Saturday, June 19, 2021

सफलता प्राप्त करने का जूनून


 वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडीसन अपने कार्य में इतने तल्लीन रहा करते थे की प्रयोगशाला से बाहर निकलने को भी फुर्सत नहीं होती थी | इस आदत से उनकी पत्नी बहुत परेशान रहती थी | एक दिन एडिसन प्रयोगशाला में कोई प्रयोग कर रहे थे | उनकी पत्नी ने उन्हें बार-बार पुकारा |

लेकिन वह इतने तल्लीन थे की उन्होंने आवाज़ नहीं सुनी |  कार्य समाप्त होने पर जब वह बाहर आए तो उनकी पत्नी बोली, ‘ आप नित्य रात-दिन काम में लगे रहते हैं | कभी मन बहलाव के लिए अन्य कार्य भी कर लिया करें |


’ एडिसन बोले, ‘ अच्छा तो बताओ, अवकाश करने मुझे कहाँ जाना चाहिए ?’ उनकी पत्नी बोली, ‘कहीं भी जा सकते हो, जहाँ आपका मन चाहे | ‘ठीक है, में वहीँ चला जाता हूँ |’ इतना कहकर वह फिर से प्रयोगशाला में चले गए |  इसे कहते है सफलता प्राप्त करने का जूनून | आप अगर सफल होना चाहते हैं तो ठीक इसी तरह अपने लक्ष्य में डूब जाये | यही सफलता की Secret हैं 

 


 सकारात्मक एडिसन – लगातार जोरों की मेहनत करने के बाद भी एडिसन को स्टोरेज बैटरी बनाने में 25 बार असफलता मिली | लेकिन वे हिम्मत नहीं हारे और उन्होंने 26 वि बार नए तरीके से अविष्कार करने का सोचा और वह सफल हुए |  स्टोरेज बैटरी को बनाने में सफलता हासिल करने के बाद किसी ने उनसे पूछा की आपको यह सफलता हासिल करने में 25 असफलताओ का सामना करना पढ़ा, इसमें आपका मूल्यवान समय व्यर्थ ही चला गया, 


इन 25 बारों के असफल प्रयोगो के बारें में आप क्या कहना चाहेंगे |  तब एडिसन ने उत्तर दिया – आपका नजरिया बिलकुल ही गलत है, मैने इन 25 असफल प्रयोगों में कुछ भी व्यर्थ नहीं गंवाया | जबकि मुझे तो 25 ऐसे तरीके मालुम हुए, जिन्हें उपयोग करने से स्टोरेज बैटरी का बनना नामुंकि होता है |

जीवन की सच्चाई


 एक शिक्षक था, जवान लडको को पेंड़ो पर चढना सिखाता था। एक लडके को सिखा रहा था। वहां एक राजकुमार सीखने के लिए आया हुआ था। राजकुमार ऊपर की चोंटी तक चढ गया था, वृक्ष की ऊपर की शाखाओं तक।  फिर उतर रहा था, वह बूढा (teacher) चुपचाप पेड़ के नीचे बैठा हुआ देख रहा था। कोई दस फ़ीट नीचे रह गया होगा वह लड़का, तब वह बूढा खडा हुआ और चिल्लाया, सावधान! बेटे सावधान होकर उतरना, होश से उतरना!  वह लड़का बहुत चकित हुआ। उसने सोचा, या तो यह बूढा पागल है। जब मैं सौ फीट ऊपर था और जहां से गिरता तो मेरे बचने का कोई chance नहीं था – 

जब मैं बिल्कुल ऊपर की चोटी पर था, तब तो यह कुछ नहीं बोला, चुपचाप आंख बंद किए, पेड़ के नीचे बैठा रहा! और अब! अब जबकि मैं नीचे ही पहुंच गया हूं, अब कोई खतरा नहीं है तो पागल चिल्ला रहा है, सावधान! सावधान!  नीचे उतरकर उसने कहा कि मैं हैरान हूं! जब मैं ऊपर था, तब तो आपने कुछ भी नहीं कहा- जब डेंजर था, खतरा था ? और जब मैं नीचे आ गया, जहां कोई खतरा न था, उस बूढें ने कहा

        मेरे जिंदगी का अनुभव यह हैं कि जहां कोई खतरा नहीं होता, वहीँ आदमी सो जाता है।  और सोते ही खतरा शुरू हो जाता है। ऊपर कोई खतरा न था… क्योंकि खतरा था और उसकी वजह से तुम जागे हुए थे, सचेत थे, तुम गिर नहीं सकते थे। मैंने आज तक ऊपर की चोटी से किसी को गिरते नहीं देखा… कितने लोगो को मैं सिखा चुका।  जब भी कोई गिरता हैं तो दस-पंद्रह फीट नीचे उतरने में या चढने में गिरता है। क्योकि वहां वह निश्चिन्त हो जाता है। निश्चिन्त होते ही सो जाता है। सोते ही खतरा मौजुद हो जाता है। जहां खतरा मौंजूद है, वहां खतरा मौंजूद नहीं होता, क्योंकि वह conscious होता है। जहां खतरा नही है, वहां खतरा मौंजूद हो जाता है, क्योंकि वह सो जाता है। इंसान सभी पक्षियों से ज्यादा सो गया है।  क्योंकि जीवन में उसने सभी पक्षियों-पशुओ से ज्यादा Security सुविधा जुटा ली है।


 कोई पशु-पक्षी इतना sleeping हुआ नहीं, जितना आदमी। देखें, किसी कौए को आपके घर के पास बैठा हुआ। जरा आप आंख भी हिलाएं और कौआ अपने पर फैला देगा। आंख हिलाएं! आप जरा हाथ हिलाएं और कौआ तैयार है, सचेत है। जानवरों को भागते हुए देखें, दौडते हुए देखें, उनको खडे हुए देखें …. वे सचेत है।  आदमी ने एक तरह की security, एक तरह की सुरक्षा अपने चारों तरफ खडी कर ली है। और उस सुरक्षा की वजह से वह आराम से सो गया है। और सच्चाई यह हैं कि सब security झुठी है। क्योंकि मौत इतनी बडी असलियत हैं कि हमारी सब सुरक्षा झूठी ही सिद्ध होती है।

       


 कोई सुरक्षा हमारी सच्ची नहीं है। लेकिन a False, एक मिथ्या खयाल हमने पैदा कर लिया है कि हम सुरक्षित है। 
सुरक्षित  असुरक्षा है, insecurity है।  कौन सी चीज सुरक्षित है ? आपकी पत्नी सुरक्षित है… कि आप सोचते हैं, कल भी वह आपकों प्रेम देगी ? आपके बच्चे सुरक्षित हैं… कि आप सोचते हैं, वे बडे होने पर आपको आदर देंगे ? आपके मित्र सुरक्षित हैं… कि वे कल शत्रु नहीं हो जाएंगे ? आप खुद किन अर्थों में सुरक्षित है ? आपकी मौत आपकी सब सुरक्षा को दो कौडी का सिद्ध कर देने को है।

Friday, June 18, 2021

महत्वकांक्षी कौआ


 एक कोआ जब-जब मोरों को देखता मन में कहता भगवान ने 
मोरों  को कितना सुन्दर रूप दिया है। यदि मैं भी ऐसा सुन्दर रूप पाता तो कितना मजा आता।  एक दिन कोए ने जंगल में मोरो के बहुत से पंख बिखरे देखे वह बहुत प्रसन्न होकर कहने लगा- वाह भगवान!

बडी कृपा की आपने जो मेरी पुकार सुन ली।  मैं अभी इन पंखों से अच्छाखासा मोर बन जाता हूं। इसके बाद कोए ने मोरों के पंख अपने पंख के आसपास लगा लिए। फिर वह नया रूप देखकर बोला- अब तो मैं मोरों से भी सुन्दर हो गया हूं, अब उन्हीं के पास चलकर आनन्द मनाता हू।  वह बडे अभिमान से मोरों के सामने पहूंचा। उसे देखते ही मोरों ने ठहाका लगाया।         

एक मोर ने कहा- जरा देखो इस दुष्ट कोए को यह हमारे फेंके हुए पंख लगाकर मोर बनने चला है।  लगाओं बदमाश को चोंचे व पंजों से कसकर ठोकरे यह सुनते ही सभी मोर कोए पर टूट पडे। और मार-मार कर उसे अधमरा कर दिया।

कोआ भागा-भागा अन्य कोओं के पास जाकर मोरो की शिकायत करने लगा तो एक बुजुर्ग कोआ बोला- सुनते हो इस अधम की बातें। यह हमारा उपहास करता था और मोर बनने के लिए बावला रहता था इसे इतना भी ज्ञान नही कि जो प्राणी अपनी ही जाति से संतुष्ट नही रहता वह हर जगह अपमान पाता है।

आज यह मोरो से निपटने के बाद हमसे मिलने आया है। इतना सुनते ही सभी कोओ ने मिलकर उसकी अच्छी मरम्मत की। 
       कथा का सार यह हैं कि ईष्वर ने ।हम हमेशा दूसरों की चीजों को देख कर सोचते हैं काश ये मेरे पास होता, लेकिन जो हमारे पास हैं उसके लिए हम कभी खुश नहीं होते जबकि ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास उतना भी नहीं होता जितना हमारे पास होता हैं

Saturday, June 12, 2021

शेख का आदेश और लुकमान की समझ


 प्राचीनकाल में अरब में आमिर लोग निर्धनों को खरीदकर गुलाम बनाकर रखते थे | ऐसा ही एक गुलाम था लुकमान | लुकमान अपने मालिक ( जो एक शेख था ) के प्रति अत्यंत वफादार था | वह अपने मालिक की हर प्रकार से सेवा करता था |

  लुकमान बुध्दिमान भी था | यह बात शेख को भी पता थी और इसलिए वह लुकमान से जब-तब तर्कपूर्ण चर्चाएं करता था | वह अक्सर लुकमान से विचित्र प्रश्न पूछकर उसके ज्ञान की परीक्षा लेता और लुकमान भी उसे कभी निराश नहीं करता था |  एक बार शेख ने उससे कहा – लुकमान ! जाओ बकरे का जो श्रेष्ठ अंग हो, उसे काटकर ले आओ | लुकमान गया और तुरंत बकरे की जीभ काटकर ले 
आया |

शेख ने पुन: उसे आदेश दिया अब जाकर बकरे का वह 
अंग लेकर आओ, जो सबसे बुरा है | लुकमान तुरंत गया और थोड़ी देर बाद एक अन्य बकरे की जीभ काटकर ले आया |  यह देख कर शेख ने कहा यह क्या, इस बार भी तुम बकरे की जीभ काट लाए ?

लुकमान ने जवाब दिया मालिक ! शरीर के अंगो में जीभ ही ऐसी है जो सबसे अच्छी भी और बुरी भी | यदि जीभ से उत्तम वाणी बोली जाए तो यह सभी को अच्छी लगती है और उसी से कटु वचन बोले जाएं तो यह सबको बुरी लगने लगती है | शेख एक बार फिर लुकमान की बुद्धि का कायल हो गया | 

सार यह हैं की वाणी की मधुरता से हम दुश्मन को भी अपना बना सकते हैं, जबकि कर्कश वाणी के चलते अपनों को भी परे होने में ज्यादा देर नहीं लगती | हमें दूसरों के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए | जीभ तो हमें परमात्मा का दिया हुआ उपकार हैं यह हमारे ऊपर निर्भर करता हैं, की हम उसका कैसा उपयोग करें | तो दोस्तों हमेशा इस जीभ का सकारात्मक उपयोग करें.

Wednesday, June 9, 2021

जरुरत से ज्यादा पाने की चाह – लोभ |

 


बचपम में मैंने एक कहानी पढी थी – एक महीला के बेटे को लडडू खाना बहुत पसंद था। और उस महिला ने लडडू बानाकर एक छोटे मूंह वाले बर्तन मे रखकर छिपा रखे थे। इच्छा होने पर बेटे ने लडडू का वह बर्तन ढूंढ निकाला।

लडडुओं की खुशबु से वह बालक मस्त हो गया।  भूख से ज्यादा इतने लड्डु देखकर उसे लोभ जागा। उसने अपने दोनो हाथ उस बर्तन में घुसेड दिये। और उनमें जितने लडडू समा सकते थे, भरकर मुट्ठियां भीच ली। लेकिन अब उसके खुली-खुली मुट्ठियों वाले हाथ बर्तन के सकरें मूंह से बाहर ही नही आ रहे थे। 
बालक लडडू छोडना नही चाहता था। और हाथ उस स्थिति में बाहर आ नही सकते थे। बालक ने जोर आजमाइश भी कर डाली। फलस्वरूप उसके हाथों की चमडी कईं जगह से छील गयी और उसे दर्द होने लगा वह बालक रोने लगा। मां दौडी आई। बेटे ने आंसुओं से भरी अपनी आंखों से, हंसती हुई मां की ओर देखकर कहा – मां मेरे हाथ बाहर निकालों।  मां ने बच्चे के सिर और पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा – बेटा! अपनी अवश्यकता और स्थितियों के अनुसार युक्तियों का भी प्रयोग करो। एक बार में इस बर्तन में एक ही हाथ डालों और एक-एक करके चाहे जितने लडडू निकाल लो। सारे लड्डू एक साथ निकालना चाहोगे, तो एक भी नही निकाल पाओगे।

 

   यह तो एक कहानी ही हैं लेकिन यह छोटी सी कहानी अति-महत्वकांक्षा लड़के-लड़ियों और ऐसे लोगेां की मानसिकता पर करारा व्यभी है। यह लोगों की एक मानसिक कमजोरी ही नहीं, यह उनका एक मानसिक रोग भी है। जरूरतों की पूर्ति करना, हमारा कर्तव्य हैं, लेकिन जरुरत से ज्यादा संग्रह करने के लिए दौड-धूप करना लोभ है। ऐसा लोभ, मानव की नैतिकता और शान्ति को समाप्त कर उसे विक्षिप्त तक बना देता है।

     आपको जो चाहिए जितना चाहिए और जिस रूप में चाहिए – अगर इसका ज्ञान आपको नही हैं और फिर भी आप उसे पाने के लिए प्रयासरत हैं, तो आप मूर्ख हैं। आपकी पारिवारिक और सामाजिक शिक्षा अपूर्ण और अधकचरी है।  यह अशिक्षा आपको शरीरिक दुःख, अभावो और मौत के मूंह में धकेल सकती है। एक पूर्ण व्यक्ति वही हैं जो इस बात को समझे | हमारे सारे दुखों की जड़ यही हैं, जरुरत से ज्यादा पाने की चाह – लोभ |  हमें अगर कुछ मिलता हो तो हम चाहेंगे की हमें और मिलें, हमें जो मिलता हैं उसमें हम कभी संतुष्ट होते ही नहीं | ज्यादा से ज्यादा पाने की चाह में लगे रहते हैं और अपने जीवन को विक्षिप्त कर बैठते हैं |

हृदयनुमा पात्र और राजा का खजाना


 एक फकीर ने एक सम्राट के द्वार पर दस्तक दी | सुबह का वक़्त था और सम्राट बगीचे में घूमने निकला था | सहयोग की बात सामने ही सम्राट मिल गया | फकीर ने अपना पात्र उसके सामने कर दिया सम्राट ने कहा क्या चाहते हो ??  फकीर ने कहा कुछ भी दे दो “शर्त एक हैं” मेरा पात्र पूरा भर जाएं | में थक गया हूँ, यह पात्र भरता ही नहीं |

सम्राट हंसने लगा और कहा तुम पागल मालुम होते हो | पागल न होते तो, फकीर ही क्यों होते, यह छोटा सा पात्र भरता नहीं ?…  फिर सम्राट ने अपने वजीर से कहा लाओ स्वर्ण-अशर्फियों से भर दो, इस फकीर का मुंह सदा के लिए बंद कर दो | फ़क़ीर ने कहा में फिर याद दिला दू की भरने की कोशिश अगर आप करते हैं तो यह शर्त है की जब तक भरेगा नहीं पात्र में हटूंगा नहीं |  सम्राट ने कहा तू घबरा मत पागल भर देंगे |

सोने से भर देंगे, हिरे जवाहरात से भर देंगे | लेकिन जल्द ही सम्राट को अपनी भूल समझ में आ गई अशर्फियां डाली गई और खो गई | हिरे डालें गयें और खो गयें | लेकिन सम्राट भी जिद्दी था और फिर फ़क़ीर से हार माने यह भी तो जंचता न था | सारी राजधानी  में खबर पहुंच गई हजारों लोग इकट्ठे हो गए |  सम्राट अपना खजाना उलीचता गया | उसने कहा आज दांव पर लग जाना हैं

सब डूबा दूंगा मगर उसका पात्र भरूंगा | शाम हो गई | सूरज ढलने लगा | सम्राट के कभी खाली न होने वाले खजाने खाली हो गए लेकिन पात्र नहीं भरा सो नहीं भरा |  वह गिर पड़ा फकीर के चरणों में और कहा मुझे माफ़ कर दो | मेरी अकड़ मिटा दी अच्छा किया | में तो सोचता था यह अक्षत खजाना है, लेकिन यह तेरे छोटे से पात्र को भी न भर पाया | बस अब एक ही प्रार्थना है में तो हार गया मुझे क्षमा कर दो |  मेने व्यर्थ ही तुझे आशवाशन दिया था भरने का | मग़र जाने से पहले एक छोटी सी बात मुझे बताते जाओ | दिन भर यही प्रश्न मेरे मन में उठेगा | यह पात्र क्या है, किस जादू से बनाया है |

फकीर हंसने लगा उसने कहा किसी जादू से नहीं ‘इसे आदमी के ह्रदय से बनाया गया है | न आदमी का ह्रदय भरता है न यह पात्र भरता है |  इस जिंदगी में कोई और चीज तुम्हे छका न सकेगी | तुम्हारा पात्रा खाली का खाली रहेगा | कितना ही धन डालो इसमें खो जाएगा | कितना ही पद डालो इसमें खो जायेगा, पात्र खाली का खाली ही रहेगा | तुम भरोगे नहीं | भरता तो आदमी तो केवल परमात्मा से हैं | क्योंकि अनंत है हमारी प्यास, अनन्त है हमारा परमात्मा तो अनंत को अनंत ही भर सकेगा |

Tuesday, June 1, 2021

मूर्खो को सीख देना पड़ा भारी , सिख के चक्कर मे चली गई जान सारी |

 


एक जंगल में एक पेड़ पर गौरेया का घोंसला था | एक दिन कड़ाके की ठण्ड पड़ रहीं थी | ठण्ड से कांपते हुए तीन चार बंदरो ने उसी पेड़ के नीचे आश्रय लिया |  एक बन्दर बोला— “कहीं से आग तपाने को मिले तो ठण्ड दूर हो सकती है |” दूसरे बन्दर ने सुझाया –“देखो, यहाँ कितनी सूखी पत्तियां गिरी पड़ी है | इन्हें इकठ्ठा कर हम ढेरी लगाते है और फिर उसे सुलगाने का उपाय सोचते हैं |”  बंदरो ने सूखी पत्तियों का ढेर बनाया और फिर गोल दायरे में बैठकर सोचने लगे की ढेरी को कैसे सुलगाया जाए | तभी एक बन्दर की नजर हवा में उड़ते एक जुगनू पर पड़ी और वह उछल पड़ा | उधर ही दौड़ता हुआ चिल्लाने लगा —- “देखो, हवा में चिंगारी उड़ रहीं है | इसे पकड़कर ढेरी के नीचे रखकर फूंक मारने से आग सुलग जाएगी |”  “हां हां! कहते हुए बाकि बन्दर भी उधर दौड़ने लगे | पेड़ पर अपने घोंसले में बैठी गौरेया यह सब तमाशा देख रही थी | उससे चुप न रहा गया | वह बोली —“बन्दर भाइयो, यह चिंगारी नहीं है | यह तो जुगनू है |” एक बन्दर क्रोध से गौरेया की और देखकर गुर्राया–“मुर्ख चिड़िया चुपचाप घोंसले में डुबकी रह | हमें सिखाने चली |”

 इस बीच एक बन्दर उछलकर जुगनू को अपनी हथेलियों के बीच कटोरा बनाकर कैद करने में सफल हो गया | जुगनू को ढेरी के नीचे रख दिया गया और सारे बन्दर लगे चारों और से ढेरी में फूंक मारने | गौरेया ने सलाह दी— “भाइयों ! आप लोग गलती कर रहे है |जुगनू से आग नहीं सुलगेगी | दो “पत्थरों को टकराकर उससे चिंगारी पैदा करके आग सुलगाएँ |”  बंदरों ने गौरेया को घूरा | आग नहीं सुलगेगी तो गौरेया फिर बोल उठी—“भाइयो ! आप मेरी सलाह मानिए, कम से कम दो सूखी लकड़ियों को आपस में रगड़कर देखिए |”सारे बन्दर आग न सुलग पाने के कारण खिंजे हुए थे | एक बन्दर क्रोध से भरकर आगे बढ़ा और उसने गौरेया को पकड़कर जोर से पेड़ के तने पर मार | गौरेया फड़फड़ाती हुई निचे गिरी और मर गई |  सिख : मूर्खों को सिख देने का कोई लाभ नहीं होता | उलटे सिख देने वाले को ही पछताना पड़ता है :

इच्छा का कोई अंत नही |


 Day – 1 जब भगवान ने दुनिया बनाई, तब उसने पहले कुत्ते को बनाया | भगवान ने कुत्ते से कहा, तुम दिन भर घर के बहार बैठे रहना और जो भी वहां से गुजरे उन पर भोंकना और में तुम्हें जीने के लिए 20 साल की उम्र देता हूँ |  कुत्ते ने कहा – यह बहुत ज्यादा हैं में 20 साल तक कैसे भोंकता रहूँगा, मुझे सिर्फ 10 साल दे दों जीने के लिए और में 10 साल आपको वापस करता हूँ | भगवान ने कुत्ते की बात मान ली और उसे 10 साल की उम्र दे दी | 

 


Day – 2 और फिर दूसरे दिन भगवान ने बंदर बनाएं और भगवान ने बंदर से कहा – तुम लोगों का मनोरंजन करना, उन्हें करतब दिखाना और उन्हें खूब हसाना | में तुम्हें जीने के लिए 20 साल की उम्र देता हूँ |  बन्दर ने कहा – करतब दिखाने के लिए 20 साल की उम्र ? आपको यह ज्यादा नहीं लगती, में भी उन कुत्तों की तरह आपको 20 साल की उम्र में से 10 साल आपको वापस लौटाता हूँ | भगवान राजी हो गया | 

 


Day – 3 दुनिया बनाने के तीसरे दिन भगवान ने गाय बनायीं | उन्होंने गाय से कहा तुम जंगलों, मैदानों में किसान के साथ जाना, दिन भर तेज़ धुप में भी किसान की गुलामी करना और उन्हें पिने के लिए दूध देने की सहायता भी करना | में तुम्हें जीने के लिए 60 साल की उम्र देता हूँ |  गाय ने कहा – इस तरह की कठिन और पारिश्रमिक जिंदगी के लिए आप मुझे 60 साल की उम्र दे रहे हैं, आप मुझे सिर्फ 20 साल की उम्र दे दो और बाकी वापस लेलों | भगवान राजी हो गएं और उन्होंने गाय की बात मान ली | 

 
Day – 4 दुनिया बनाने के चौथे दिन भगवान ने इंसान को बनाया, और कहा तुम – सोना, भर-पेट खाना, खेलना, शादी करना, अपनी जिंदगी में खूब मजे करना में तुम्हें जीने के लिए 20 साल देता हूँ |  इंसान ने कहा – क्या ? सिर्फ २० साल ? में बताता हूँ आपको, में मेरे 20 साल, और 40 वो जो गाय ने आपको दियें थे, 10-10 वो जो कुत्ते और बन्दर ने आपको दियें थे, यह सब कर के 80 होते हैं, और मुझे इतना ही चाहिए, ठीक हैं ? भगवान राजी हो गएं और उन्होंने हां कर दी |  हर पल मरने वालों को जीने के लिए भी वक्त नहीं | जो जस करई सो तस फल चाखा तो इसीलिए हमारे जीवन के पहले 20 साल हम खूब खाते हैं, सोते हैं, खेलतें हैं, और अपने जीवन को ठीक से जी पाते हैं | फिर अगले 40 साल हम गुलामी करते हैं, अपने परिवार की रक्षा करते हैं, फिर अगले 10 साल हम बंदरो की तरह अपने पोते-पोतियों को हँसाते हैं और फिर आखिरी 10 साल हम एक जगह बैठ जातें हैं और घर के सदस्यों पर भोंकते हैं |  मनुष्य जिंदगी को आपके सामने बहुत अच्छे से Explained कर दिया गया हैं. (हमारी और-और मांगने की आदत से ही हम परेशान हैं, हमें जितना मिलता हैं उससे हम कभी संतुष्ट ही कहा हुए | हमारे दुखो का कारण सिर्फ एक है और वह हैं – असंतुष्टि

मैं ही गरीब क्‍यों? भगवान गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी

क्यों पढ़े - आजकल के दौर में अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मैं ही गरीब क्यों। मैं ही दूसरों से कमजोर क्यों हूँ? उन...